रहीम दास जी के दोहे

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Rahim Das Ke Dohe

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय.
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय.

रहीम दास के दोहे 

  बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय.
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय.

अर्थ : मनुष्य को सोचसमझ कर व्यवहार करना चाहिए,क्योंकि किसी कारणवश यदि बात बिगड़ जाती है तो फिर उसे बनाना कठिन होता है, जैसे यदि एकबार दूध फट गया तो लाख कोशिश करने पर भी उसे मथ कर मक्खन नहीं निकाला जा सकेगा.

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय.
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि प्रेम का नाता नाज़ुक होता है. इसे झटका देकर तोड़ना उचित नहीं होता. यदि यह प्रेम का धागा एक बार टूट जाता है तो फिर इसे मिलाना कठिन होता है और यदि मिल भी जाए तो टूटे हुए धागों के बीच में गाँठ पड़ जाती है.

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि.
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देख कर छोटी वस्तु को फेंक नहीं देना चाहिए. जहां छोटी सी सुई काम आती है, वहां तलवार बेचारी क्या कर सकती है?

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग.
चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि जो अच्छे स्वभाव के मनुष्य होते हैं,उनको बुरी संगति भी बिगाड़ नहीं पाती. जहरीले सांप चन्दन के वृक्ष से लिपटे रहने पर भी उस पर कोई जहरीला प्रभाव नहीं डाल पाते.

रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार.
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार.

अर्थ : यदि आपका प्रिय सौ बार भी रूठे, तो भी रूठे हुए प्रिय को मनाना चाहिए,क्योंकि यदि मोतियों की माला टूट जाए तो उन मोतियों को बार बार धागे में पिरो लेना चाहिए.

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं.
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि बड़े को छोटा कहने से बड़े का बड़प्पन नहीं घटता, क्योंकि गिरिधर (कृष्ण) को मुरलीधर कहने से उनकी महिमा में कमी नहीं होती.

जैसी परे सो सहि रहे, कहि रहीम यह देह.
धरती ही पर परत है, सीत घाम औ मेह.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि जैसी इस देह पर पड़ती है – सहन करनी चाहिए, क्योंकि इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा पड़ती है. अर्थात जैसे धरती शीत, धूप और वर्षा सहन करती है, उसी प्रकार शरीर को सुख-दुःख सहन करना चाहिए.

 खीरा सिर ते काटि के, मलियत लौंन लगाय.
रहिमन करुए मुखन को, चाहिए यही सजाय.

अर्थ : खीरे का कडुवापन दूर करने के लिए उसके ऊपरी सिरे को काटने के बाद नमक लगा कर घिसा जाता है. रहीम कहते हैं कि कड़ुवे मुंह वाले के लिए – कटु वचन बोलने वाले के लिए यही सजा ठीक है.

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं.
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं.

अर्थ : कौआ और कोयल रंग में एक समान होते हैं। जब तक ये बोलते नहीं तब तक इनकी पहचान नहीं हो पाती।लेकिन जब वसंत ऋतु आती है तो कोयल की मधुर आवाज़ से दोनों का अंतर स्पष्ट हो जाता है.

रहिमन अंसुवा नयन ढरि, जिय दुःख प्रगट करेइ,
जाहि निकारौ गेह ते, कस न भेद कहि देइ.

अर्थ : रहीम कहते हैं की आंसू नयनों से बहकर मन का दुःख प्रकट कर देते हैं। सत्य ही है कि जिसे घर से निकाला जाएगा वह घर का भेद दूसरों से कह ही देगा.

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय.
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय.

अर्थ : रहीम कहते हैं की अपने मन के दुःख को मन के भीतर छिपा कर ही रखना चाहिए। दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता.

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन.
अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन.

अर्थ : वर्षा ऋतु को देखकर कोयल और रहीम के मन ने मौन साध लिया है. अब तो मेंढक ही बोलने वाले हैं। हमारी तो कोई बात ही नहीं पूछता. अभिप्राय यह है कि कुछ अवसर ऐसे आते हैं जब गुणवान को चुप रह जाना पड़ता है. उनका कोई आदर नहीं करता और गुणहीन वाचाल व्यक्तियों का ही बोलबाला हो जाता है.

रहिमन विपदा हू भली, जो थोरे दिन होय.
हित अनहित या जगत में, जान परत सब कोय.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि यदि विपत्ति कुछ समय की हो तो वह भी ठीक ही है, क्योंकि विपत्ति में ही सबके विषय में जाना जा सकता है कि संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन नहीं।

वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग.
बांटन वारे को लगे, ज्यों मेंहदी को रंग.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि वे लोग धन्य हैं जिनका शरीर सदा सबका उपकार करता है. जिस प्रकार मेंहदी बांटने वाले के अंग पर भी मेंहदी का रंग लग जाता है, उसी प्रकार परोपकारी का शरीर भी सुशोभित रहता है.

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात.
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात.

अर्थ : रहीम कहते हैं कि उपयुक्त समय आने पर वृक्ष में फल लगता है। झड़ने का समय आने पर वह झड़ जाता है. सदा किसी की अवस्था एक जैसी नहीं रहती, इसलिए दुःख के समय पछताना व्यर्थ है.

————–कबीर दास जी के दोहे———————

—————गोस्वामी तुलसीदास जी के दोहे—————-

Vijaya Sati

Vijaya Sati

रहीम दास जी के दोहों का यह संकलन विजया सती जी ने किया है . इन्हें देश -विदेश में हिन्दी भाषा पढ़ने और पढ़ाने  में विशेष रूचि है साथ ही इन्हें लिखना भी पसंद है.

I am grateful to Vijaya Sati Ji for sharing this wonderful collection of “Rahim Das Ji Ke Dohe” with AKC.

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178 thoughts on “रहीम दास जी के दोहे

  1. vijaya

    Jaal pare jal jat bahi, taji meenan ko moh
    Raheeman machhari neer ko, tau na chhadat chhoh

    आपको भी धन्यवाद ! दोहे का अर्थ यह है –
    जब मछली पकड़ने के लिए जाल डाला जाता है तो जल – पानी – तो मछलियों का मोह छोड़ कर बह जाता है. रहीम कहते हैं कि
    लेकिन मछली तब भी पानी के प्रति अपने स्नेह को नहीं त्यागती और पानी से अलग होते ही अपने प्राण त्याग देती है ! यही प्रेम की पराकाष्ठा है – प्रेम की महत्ता या महानता है कि साथ जिएँ और साथ मरें ! ( पर आजकल के समय में यह संभव कहाँ?) लेकिन कवि ने एक आदर्श दिया कि प्रेम ऐसा होना चाहिए !

    Reply
  2. neeta ratre

    me jab bhi yah site open karkae dohe paadhati he to mujhe mere bachpan ki yaad aa jati he kaise hum inki antakshri khale the or me hamesh winner rahati thi

    Reply
  3. Poulomi

    Vijaya ji, thanks a lot! I am looking forward to some more explanations… Please consider my humble request and explain some more of Raheemdas ji ke dohe….like….
    Je raheem gati deep ki, kul kaput ki soye
    Bare ujiaro Kare, badhe andhero hoye

    Jaal pare jal jat bahi, taji meenan ko moh
    Raheeman machhari neer ko, tau na chhadat chhoh

    Reply
    1. vijaya

      रहीम के दो महत्वपूर्ण दोहे !
      जो रहीम गति दीप की कुल कुपूत गति सोय
      बारे उजियारो करे बढे अंधेरो होय.
      रहीम कहते हैं कि जो गति या स्थिति दीपक की होती है वही वंश में कुपुत्र की भी होती है. जब दीपक जलता है तो उजाला कर देता है और जब बुझ जाता है तो अन्धकार छा जाता है. इसी तरह परिवार में पुत्र का जन्म तो खुशी का कारण बनता है पर फिर उकुपुत्र होने पर उसके बुरे कर्म अंधकार – दुःख या निराशा भरने लगते हैं.
      बारे – दीपक – जलना
      बारे – कुपूत- बचपन
      बढ़े – दीपक -बुझना
      बढ़े- कुपुत्र- बड़ा होना

      जब मछली पकड़ने का जाल पानी में डाला जाता है तब पानी मछलियों की कोई परवाह नहीं करता – उनका ध्यान छोड़ कर बस बह जाता है. लेकिन मछलियाँ फिर भी पानी का मोह नहीं त्यागती और उससे अलग होते ही अपने प्राण त्याग देती हैं !

      Reply
    1. sabhir

      Kya kahun hamare purvaj achhe vichran ke liye bahut kuchh kah gayen hain. Ek ham hain ki us par amal
      nahin karte hain.Rahim Ji ko pranam hai.

      Reply
  4. Rakhi

    बहुत बढ़िया!
    सुझाव.. सुजन मतलब सु जन. अच्छे, आदरणीय व्यक्ति. प्रिय नहीं।
    प्रणाम!

    Reply
    1. vijaya

      आभार राखी – दोहे की व्याख्या में प्रिय के स्थान पर अच्छे जन -सज्जन – लिखना ही उचित होता
      सामान्यत: सुजन – सज्जन- आदरणीय -अच्छे जन यानी प्रियजन !

      Reply
  5. Ram bujh

    Me udaipur me teacher training kr RHA hu me
    Jb stage PR jaata hu to kabir ji k doho ka vachan krta hu
    Kbir ji k dohe ka sanklan acha ye jivan k liye upyogi he.

    Thanks

    Reply
  6. radhey Nagar

    Aapke dwara kiye gye dohe ka sankalan mujhe bhut aachaa lgaa, aur Maine yh dohe meri note book me bhi likhe hai…
    tnankss… Hpy Diwali …

    Reply
  7. maya kumawat

    Apke dwara kiya gaya doho ka sankalan bahut acha h.mai hindi&samskrit ki teacher hu.ye dohe maine bachon ko bhi sunaye.bachon ko bhi ache lage.thnx

    Reply

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