जीवन, शिक्षा और संघर्ष की कहानी|Dr. B. R. Ambedkar Full Biography

तेलंगाना की कोंगारा नागमणि, एक जांबाज पुलिस constable थी…..पर 2 December 2024 को उसके भाई ने ही बेरहमी से उसकी हत्या कर दी…
जानते हैं क्यों?
क्योंकि उसने एक दलित लड़के से शादी कर ली थी!
नमस्कार, दोस्तों, मैं हूँ अजय अजमेरा और आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या आज के आधुनिक भारत में भी दलित होना इतना बड़ा पाप है कि एक सगा भाई सिर्फ इसलिए अपनी बहन को जान से मार देता है क्योंकि उसने एक दलित लड़के को अपना जीवन साथी चुना?
दुर्भाग्यवश, आज भी ऐसे लोग हैं जिनकी नज़र में दलित होना पाप है, जिनकी नज़र में SC-ST होना अछूत होने के समान है!
सोचिये! जब आज की तारीख में ऐसा हो सकता है तब 135 साल पहले की स्थिति क्या रही होगी? तब शायद उस लड़की को तो मारा ही जाता, पर उस दलित लड़के के पूरे परिवार को जिंदा जला दिया जाता! और ऐसी ही विकट सामाजिक स्थिति के बीच भारत माँ की कोख से उस नन्हे से फ़रिश्ते ने एक दलित परिवार में जन्म लिया, जिसे आज पूरी दुनिया डॉ. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के नाम से जानती है!
चौदह अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में अपने माता-पिता की चौदहवीं और आखिरी संतान के रूप में जन्मा वो फ़रिश्ता इतना महान था कि जब दुनिया वालों ने उसे पढ़ने के लिए क्लास में बैठने तक नहीं दिया, तब उसने अपनी मेहनत, लगन और कभी हार न मानने वाले जज़्बे से 32 डिग्रियां हासिल कर लीं!
जब दुनिया ने उसकी छुई हुई कलम को हाथ तक लगाने से इनकार कर दिया तब उसी कलम से उसने करोड़ों हिन्दुस्तानियों का मुस्तकबिल….यानी उनका संविधान लिख डाला.
कितना महान था वो व्यक्तित्व जिसने पांच हज़ार वर्षों से अछूत का लेबल लगा कर जीने को मजबूर करोड़ों हिन्दुस्तानियों के ऊपर से वो लेबल उखाड़ कर हमेशा-हमेशा के लिए फेंक दिया और पहली बार उन्हें ऊंची जाति के लोगों के साथ बराबरी का अधिकार दिया.
पर ये सफर इतना आसान न था!
जिस शेर ने अपनी दहाड़ से सदियों पुरानी व्यवस्था की चूलें हिला दीं….वो कोई साधारण शेर नहीं था….
वो घायल था…और शायद इसीलिए घातक था!
और उसे घायल करने वाला था ये हिन्दू समाज, जिसका वह खुद एक हिस्सा था.
दोस्तों, बाबा साहेब के घायल होने, यानी अपमानित होने की कई घटनाएं हैं, जो उस समय उनकी मनोस्थिति समझने के लिए आपको जरूर जाननी चाहिए!

बचपन से ही उनके अन्दर पढ़ने की बहुत ललक थी…पर जब उन्होंने आम बच्चों की तरह स्कूल जाना चाहा तो कहीं उन्हें एडमिशन नहीं मिलता तो कहीं कक्षा के बाहर बैठने का आदेश हो जाता…. यही नहीं, उन्हें अपनी परछाईं भी ऊंची जाति के लोगों से दूर रखने की सख्त हिदायत दी जाती.
और पानी? दोस्तों, पानी के लिए उनकी एक अलग ही कहानी थी. स्कूल का नल छूने का अधिकार नहीं था. पानी तभी मिलता था जब चपरासी मौजूद हो. अगर चपरासी नहीं आया, तो पानी नहीं. इस पूरी तकलीफ को बाबा साहेब ने बाद में अपने एक लेख में सिर्फ चार शब्दों में समेट दिया.
“No peon, no water.”
चार शब्द. और उन चार शब्दों में एक पूरी सभ्यता का दर्द छुपा था.
इन सबसे परेशान होकर एक दिन बाबासाहेब ने अपनी माँ से पूछा, “हमारे साथ ऐसा गंदा व्यवहार क्यों किया जाता है? कहाँ लिखा है कि हम नीची जाति के हैं, और बाकी लोगों की तरह कक्षा में बैठ कर पढ़ाई नहीं कर सकते?”
तब माँ ने कहा ये सब पुराने ग्रंथों में लिखा है…’मनुस्मृति’ में लिखा है…. उसी दिन बाबा साहेब ने कहा था…. “माँ जब मैं अपनी किताब लिखूंगा…तो उसमे हर कोई बराबर होगा….किसी के साथ भी गलत व्यवहार नहीं किया जाएगा….” और आगे चल कर उन्होंने ना सिर्फ मनुस्मृति की प्रतियां जलाईं बल्कि भारत का संविधान लिख कर सभी को बराबरी का अधिकार दिया!
दोस्तों, बाबासाहेब के घायल होने की एक और घटना याद आती है.
एक बार भीमराव और उनके भाई सतारा जा रहे थे. स्टेशन पर उतरे तो आगे जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा था. बड़ी मुश्किल से एक टाँगे वाले ने बैठाया….पर जैसे ही उसे उनकी जाति का पता चला, उसने फ़ौरन उन्हें टाँगे से उतार दिया. रात काफी हो चुकी थी, दोनों भाई अनजान जगह, अंधेरे में खड़े थे…पर किसी ने उन्हें पनाह नहीं दी. उस रात जो दर्द भीमराव ने महसूस किया…उस दर्द ने उन्हें अपने लोगों के लिए कुछ करने की जिद्द दी.
और दोस्तों, अब मैं जिस घटना का जिक्र करने जा रहा हूँ, उसे सुनकर आपकी भी रूह कांप जाएगी. ये वो पल था जब दुनिया को रास्ता दिखाने वाले बाबा साहेब खुद बीच सड़क पर टूट-टूट कर रो पड़े थे. लेकिन याद रहे, वो महज आंसू नहीं थे… बल्कि उन आंसुओं की हर एक बूंद से एक ऐसा प्रचंड संकल्प जन्म ले रहा था, जिसने आगे चलकर सदियों पुरानी गुलामी की जंजीरों को काट फेंका.
साल 1917 की घटना है,

न्यूयॉर्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी कर, आँखों में बड़े सपने और हाथों में बड़ी डिग्रियां लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर बड़ौदा के महाराजा के बुलाने पर बड़ोदा आये. उन्हें राज्य का Defence Secretary नियुक्त किया गया था, जो अपने आप में बहुत बड़ा पद था, और इसके बाद उन्हें वित्त मंत्री भी बनाया जाने वाला था. महाराज के कहने के बावजूद कोई भी व्यक्ति उन्हें स्टेशन पर लेने नहीं पहुंचा.
जब उन्होंने हिन्दू होटलों में ठहरने की सोची तो किसी ने उन्हें कमरा नहीं दिया.
उनका ओहदा, उनकी डिग्रियां, उनका ज्ञान सबकुछ उनकी जाति के सामने छोटा दिखाई देने लगा.
अम्बेडकर जी के लिए भी ये Shocking था, मजबूरन उन्होंने अपनी आइडेंटिटी छिपा कर एक पारसी होटल में कमरा लिया.
अगले दिन जब वे अपने ऑफिस में बैठे तो अपमान की एक नई श्रृंखला शुरू हुई! पीने के लिए औरों से अलग पानी, बैठने के लिए औरों से दूर अलग स्थान, चपरासी भी दूर खड़े होकर बात करता, और फाइलें भी फेंक कर देता….जितना बड़ा पद, उतना बड़ा अपमान, भला ये कैसा विरोधाभास था. उन्हें किस बात की सजा दी जा रही थी!
पर अभी तो सबसे बड़ी विपदा आना बाकी ही थी.
कुछ दिनों में पारसी होटल वाले को भी उनकी असली जाति का पता चल गया. फिर तो मानो बवाल ही मच गया…. बाबा साहेब को लोगों ने लाठी-डंडों के साथ घेर लिया, गंदी-गंदी गालियाँ दीं, उनका सामान उठा कर बाहर फेंक दिया गया….उन पर होटल को दूषित करने का आरोप लगाया गया!
दोस्तों, ये चोटें उनके शरीर पर कम आत्मा पर ज्यादा लगीं थीं….
बाबा साहेब ने बड़ोदा छोड़ने का निश्चय कर लिया. जाने से पहले वे एक बरगद के पेड़ के नीचे रुके और फूट-फूट कर रोये….उन्होंने सोचा, “अगर मुझ जैसा पढ़ा-लिखा, उच्च पद पर कार्यरत व्यक्ति इस कदर अपमानित हो सकता है, तो मेरे समाज के उन लाखों अनपढ़ और गरीब लोगों का क्या हाल होता होगा?
और तब उन्होंने उसी पेड़ के नीचे ‘संकल्प’ लिया कि मैं अपना पूरा जीवन छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने और दलितों को उनका हक दिलाने में लगा दूंगा.

आज वडोदरा की वह जगह ‘संकल्प भूमि’ के नाम से जानी जाती है. यह सिर्फ एक स्मारक नहीं, बल्कि उस चिंगारी का प्रतीक है जिसने करोड़ों लोगों के जीवन में रोशनी भरी. यह वह स्थान है जहाँ एक ‘अपमानित युवक’ भारत के ‘संविधान निर्माता’ बनने की राह पर निकल पड़ा था.
1917 में बड़ौदा छोड़ने के बाद उनके पास न नौकरी थी, न रहने का ठिकाना. पर उनके पास था, अथाह ज्ञान का भंडार और संघर्ष करने की अटूट शक्ति.
बड़ौदा से मुंबई वापस आकर भीमराव के सामने सबसे बड़ा सवाल था, पेट कैसे पालें?
उन्होंने शेयर बाज़ार के लिए एक सलाहकार के रूप में काम शुरू किया. लोग उनकी सलाह लेने आते, उनकी बुद्धिमत्ता के कायल हो जाते, लेकिन जैसे ही उन्हें पता चलता कि ये ‘अछूत’ समाज से हैं, वे अगले दिन से आना बंद कर देते.
हार मानकर उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया. नवंबर 1918 में, वे मुंबई के प्रसिद्ध सिडेनहम कॉलेज में प्रोफेसर बने. छात्र उनके ज्ञान के दीवाने थे, लेकिन वहाँ के स्टाफ रूम में भी छुआछूत का जहर फैला हुआ था.
लोग यहाँ भी उनसे कटते थे, उनके साथ उठने-बैठने, खाने-पीने से बचते थे. खैर इस व्यवहार के तो वो आदी हो चुके थे… बल्कि कोई ऐसा न करे तो उन्हें आश्चर्य होता था.
और ऐसा ही एक आश्चर्य उन्हें कोल्हापुर के छत्रपति शाहू जी महाराज के दृष्टिकोण में दिखा. महाराज ने भीमराव की प्रतिभा को पहचाना और 31 जनवरी 1920 को ‘मूकनायक’ अखबार शुरू करने में मदद की, और लंदन जा कर कानून की पढ़ाई करने में भी उनका सहयोग किया.
शाहू जी महाराज ने तब छोटी-पिछड़ी जातियों के समक्ष एक भविष्यवाणी की थी. “आपको अपना नेता मिल गया है, यह व्यक्ति न सिर्फ आपका बल्कि पूरे भारत का उद्धार करेगा.”
और आगे चल कर उस भविष्यवाणी का एक-एक शब्द सच निकला.
अब बात करते हैं उस बलिदान की, जिसकी चर्चा बहुत कम होती है

दोस्तों, अक्सर हम बाबा साहेब की उपलब्धियों की बात करते हैं, पर उन उपलब्धियों के पीछे एक महिला का मौन बलिदान छिपा है, उनकी पत्नी रमाबाई अंबेडकर.
जब भीमराव दोबारा अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने लंदन गए, तो पीछे से रमाबाई ने मुंबई की एक चॉल में रहकर गरीबी के सबसे भयानक दिन काटे. घर चलाने के लिए उन्होंने गोबर के उपले तक बेचे. उनके पाँच बच्चों में से चार एक-एक करके चल बसे…. गंगाधर, रमेश, राजरत्न और इंदु, इलाज और पोषण की कमी के कारण एक-एक करके दुनिया छोड़ गए, बचे सिर्फ यशवंत राव.
चार बच्चे. चार मौतें. और हर बार खबर मिलती थी, दूर लंदन में बैठे एक बाप को…क्या आप बाबा साहेब के उस व्यक्तिगत दुख का अंदाजा लगा सकते हैं!
कोई आम इंसान होता तो सब कुछ छोड़ छाड़ कर परिवार के लिए वापस आया जाता…पर बाबा साहेब तो करोड़ों दलितों को अपना परिवार मान चुके थे! ज़िन्दगी भर आंसुओं को पीने वाले भीमराव इन आंसुओं को भी पी गए!
अगर इधर परिवार मुसीबत में था तो उधर लंदन में, बाबा साहेब के पास भी खाने के पैसे नहीं थे. वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की लाइब्रेरी में सुबह से शाम तक बिना कुछ खाए बैठे रहते. उनका दोपहर का भोजन अक्सर सिर्फ एक सूखा पाव और थोड़ा सा जैम होता था. वे पैदल मीलों चलते ताकि बस का किराया बचा सकें और उससे किताबें खरीद सकें.
एक बार तो लाइब्रेरी के लंच टाइम में, अकेले बैठकर वो सूखा पाव खाते हुए लाइब्रेरियन ने उन्हें पकड़ लिया. फटकारा कि कैफेटेरिया क्यों नहीं गए. बाबा साहेब ने कहा, “मेरे पास वहाँ खाने के पैसे नहीं हैं.”
उस लाइब्रेरियन ने, जो एक यहूदी था, जिसने खुद अपनी कौम पर हुए अत्याचार को जिया था, कहा, “कल से तुम मेरे साथ कैफेटेरिया चलोगे. मैं तुमसे अपना खाना शेयर करूंगा.”
दोस्तों, एक यहूदी ने उस इंसान के साथ खाना खाया जिसे उसके अपने हिंदुस्तान में पानी पीने का हक नहीं था. तभी से बाबा साहेब के मन में यहूदियों के लिए एक विशेष प्रेम था.
उनके पढ़ाई के दिनों से जुड़ी एक और घटना याद आती है…
एक बार किसी ने उनसे पूछा था, “क्यों तुम हमेशा गंभीर रहते हो? बस पढ़ाई ही करते रहते हो, कभी दोस्तों के साथ मौज-मस्ती नहीं करते?”
तब बाबा साहेब ने जो जवाब दिया… “अगर मैं मौज-मस्ती में रह गया… तो मेरे लोगों का ख़याल कौन रखेगा?”
दोस्तों, 1923 में जब बाबा साहेब बैरिस्टर बनकर लौटे, तो उनके पास सिर्फ कानून की डिग्री नहीं थी, बल्कि बड़ौदा के अपमान का हिसाब चुकाने का संवैधानिक ब्लूप्रिंट तैयार था.
5 जुलाई 1923 को उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की और अपने काले कोट को शोषितों की ढाल बना लिया.
20 मार्च 1927… महाड़ के चवदार तालाब की ऐतिहासिक घटना आपको जरूर जाननी चाहिए….

हजारों वर्षों से उस तालाब का पानी कुत्ते-बिल्ली पी सकते थे, लेकिन दलितों को उसे छूने की मनाही थी. बाबा साहेब हजारों लोगों के साथ उस तालाब की ओर बढ़े. ऊंची जाति के लोग लाठियां लेकर खड़े थे, धर्म के ठेकेदार धमकियां दे रहे थे… पर वो ‘घायल शेर’ आज रुकने वाला नहीं था.
जैसे ही बाबा साहेब ने उस पानी को अपनी अंजलि में भरकर पिया, मानों सदियों की प्यास बुझ गई और गुलामी की बेड़ियाँ पिघल गईं. यह सिर्फ पानी पीना नहीं था, यह इंसान होने के अधिकार का ऐलान था. उसी साल दिसंबर में उन्होंने ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाकर यह संदेश दिया कि जो किताब इंसान को इंसान न समझे, उसे जला देना ही न्याय है.
1930 का दशक आते-आते अंबेडकर भारतीय राजनीति के वो ध्रुव बन गए थे जिन्हें नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन था. जब वे ‘लंदन राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस’ में गए, तो उन्होंने अंग्रेज सरकार की आँखों में आँखें डालकर दलितों के लिए ‘Separate Electorate’ यानी स्वतंत्र निर्वाचन की मांग की.
यहाँ मोड़ आता है महात्मा गांधी और बाबा साहेब के टकराव का
कहते हैं जब गांधी जी से वे पहली बार मिलने गए तो गांधी जी ने उन्हें ignore किया… वे बाबा साहेब से मन ही मन नाराज़ थे!
जब संवाद हुआ तो गांधी जी बोले, “मैं अछूतों की समस्याओं के बारे में तब से सोच रहा हूँ जब आप पैदा भी नहीं हुए थे. मुझे आश्चर्य है कि इसके बावजूद आप मुझे उनका हितैषी नहीं मानते.”
दोस्तों, उस समय गांधी जी एक राजनेता से कहीं बढ़ कर एक संत थे, जिन्हें भगवान की तरह पूजा जाता था….उनकी बात काटना तो दूर, किसी के लिए उनके तरीकों और विचारों से अलग सोचना भी मुश्किल था!
पर निडरता देखिये बाबा साहेब की!
वे गांधी जी से बोले, “यदि आप दलितों के सच्चे समर्थक होते, तो कांग्रेस का सदस्य बनने के लिए खादी पहनने की शर्त के बजाय, अस्पृश्यता निवारण को पहली शर्त बनाते.”
बाद में बाबा साहेब ने ये भी कहा कि भारत में कई महात्मा आये और गए लेकिन अछूत अछूत ही बने रहे.
दोस्तों, गांधी जी और बाबा साहेब दोनों ही दलितों का कल्याण चाहते थे. गांधी जी उन्हें हरिजन कहते थे, उनका तरीका नैतिकता और इंसान को अन्दर से बदलने की कोशिशों पर आधारित था, पर बाबा साहेब जानते थे पांच हज़ार सालों की आदत किसी के समझाने-बुझाने से नहीं जाने वाली….उसके लिए जरूरी था एक ऐसा कानून जो दलितों का कल्याण करे, उन्हें बराबरी का अवसर दे!
दलितों के लिए ‘Separate Electorate’ की बात आई तो गांधी जी को लगा कि इससे हिंदू समाज बंट जाएगा और उन्होंने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया. पूरा देश बाबा साहेब को ‘गांधी जी की जान का दुश्मन’ कहने लगा.
बाबा साहेब के सामने एक तरफ उनके समाज का भविष्य था और दूसरी तरफ गांधी जी का जीवन. भारी मन से, 1932 में उन्होंने ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए. उन्होंने गांधी जी की जान तो बचा ली, लेकिन उन्होंने ये साफ कर दिया कि “मेरा समाज दया का नहीं, अधिकार का हकदार है.”
और बाद में उन्होंने एक बात और कही जिसने गांधी जी को भी जरूर कचोटा होगा…. “गांधी जी इतने आमरण अनशन करते हैं….तो एक बार वे छुआछूत दूर करने के लिए आमरण अनशन पर क्यों नहीं बैठ गए?”

कितने निडर थे अम्बेडकर जो अपने लोगों के लिए देश की सबसे बड़ी शख्सियत के सामने भी झुकने के लिए तैयार नहीं हुए….
यही नहीं एक बार श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने जब संस्कृत में वार्तालाप शुरू किया तो संविधान Drafting Committee के सभी सदस्य मौन हो गए….क्योंकि संस्कृत बोलना अंग्रेजी बोलने से भी कहीं कठिन था….पर उस समय एक और आवाज़ हॉल में गूँज उठी जो धाराप्रवाह संस्कृत बोल रही थी….वो वाणी थी भीम राव अम्बेडकर की….अशिक्षित दलित परिवार में जन्मे बाबासाहेब भी संस्कृत भाषा पर इतनी पकड़ रखते हैं यह किसी ने नहीं सोचा था…. जल्द ही ये बात मीडिया में छा गई और सभी आंबेडकर जी के ज्ञान का लोहा मानने लगे.
दोस्तों, बाबा साहेब कहा करते थे, “शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा!”
और उसी शिक्षा के बल पर बाबा साहेब हर मंच पर दहाड़ा करते थे.
शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बाबासाहेब की पर्सनल लाइब्रेरी दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत लाइब्रेरी थी, जिसमे चालीस से 50 हज़ार पुस्तकें थीं. एक बार किसी ने उनसे पूछा, “अरे कितना पढ़ोगे…थोड़ा रेस्ट कर लिया करो!”
तब बाबा साहेब ने कहा था, “कोई नई किताब पढ़ना ही मेरे लिए रेस्ट करना है!”
किताबों के अलावा उन्हें बागवानी का भी बहुत शौक था और वे डॉग लवर भी थे, कहते हैं, अपने कुत्ते Tobby की मौत पर बाबा साहेब बहुत रोये थे!
दोस्तों, पर्सनल बातें उठी हैं तो मैं यहाँ एक बात और क्लियर करना चाहूँगा… बाबा साहेब दलितों का कल्याण जरूर करना चाहते थे, पर ऊंची जाति के लिए उनके मन में नफरत नहीं थी. इसके दो सबसे बड़े उदाहरण हैं.
पहला, डॉ. अम्बेडकर का मूल नाम था अम्बावाडेकर, लेकिन एक ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर बाबा साहेब को बहुत मानते थे, उस जमाने में वे बालक बाबा साहेब के साथ अपना भोजन साझा किया करते थे, उन्होंने ही अपना नाम बाबा साहेब के साथ जोड़कर उन्हें बराबरी का सम्मान दिया था, जिसे बाबा साहेब ने जीवन भर याद भी रखा.
दूसरा, 1935 में पहली पत्नी रमाबाई के देहांत के बाद बाबा साहेब का ध्यान रखने वाला कोई नहीं था. तब एक ब्राह्मण महिला Dr. Sharada Kabir ने उनकी खूब सेवा की, इस निःस्वार्थ प्रेम को देखकर बाबा साहेब ने उनसे 1948 में दूसरी शादी की.
यानी बाबा साहेब इंसान को देखते थे, उसकी जाति को नहीं!
बाबा साहेब के जीवन की व्यक्तिगत बातें चल ही रही हैं तो उनकी…
ईमानदारी का भी एक किस्सा आपको जरूर सुनाना चाहूँगा
1943 में बाबा साहेब को वाइसराय काउंसिल में शामिल किया गया और उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया. बाबा साहेब के एक सिग्नेचर से किसी को भी करोड़ों का ठेका मिल सकता था. इसी लालच में एक ठेकेदार ने बाबा साहेब के बेटे यशवंत राव को ठेका दिलवाने पर मोटा कमीशन देने का लालच दिया.
यशवंत राव उसके झांसे में आ गए और पिता के पास पहुंचे.
पर जैसे ही बाबा साहेब ने ये बात सुनी, वो आग-बबूला हो गए. उन्होंने कहा,
“मैं यहाँ पर केवल समाज के उद्धार के ध्येय को लेकर आया हूँ. अपनी संतान को पालने नहीं आया हूँ. ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते.”
और उसी रात यशवंत को भूखे पेट मुंबई वापस भेज दिया.
आज करोड़ों लोग बाबा साहेब को बस संविधान से जोड़ कर देखते हैं, पर शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बाबा साहेब ने सिर्फ दलितों का ही कल्याण नहीं किया बल्कि भारत के करोड़ों मजदूरों और महिलाओं का भी कल्याण किया.
पहले लोग फैक्ट्रियों में 12-14 घंटे काम करने के लिए मजबूर थे, पर बाबा साहेब ने 8 घंटे की शिफ्ट का नियम बनाया.
वो बाबासाहेब ही थे जिन्होंने महिला श्रमिकों के लिए
Maternity Benefit for Women Labor, Women Labor Welfare Fund, Women and Child Labor Protection Act जैसे कानून बनाए.
यही नहीं, भारत के बेहतर विकास के लिए 50 के दशक में बाबासाहेब ने ही सबसे पहले मध्य प्रदेश और बिहार के विभाजन का प्रस्ताव रखा था, पर सन 2000 में जाकर ही इनका विभाजन कर छत्तीसगढ़ और झारखण्ड का गठन किया गया.
नदियों को जोड़ने का आइडिया भी सबसे पहले बाबा साहेब ने ही दिया था.
वे इतने महान थे कि Economics के Nobel Prize विजेता अमर्त्य सेन तक ने कहा कि वो बाबा साहेब को अर्थशास्त्र में अपना गुरु मानते हैं.
खैर, आगे बढ़ते हैं उस दिन की तरफ जिसने नियति का चक्र घुमा दिया.
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ. जिस समाज ने भीमराव को स्कूल में घुसने नहीं दिया, जिस देश ने उन्हें अछूत कहा, उसी देश का भविष्य लिखने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आई.
डॉ. अंबेडकर को संविधान मसौदा समिति का अध्यक्ष बनाया गया. 2 साल, 11 महीने और 18 दिन तक, अपनी गिरती हुई सेहत के बावजूद, उन्होंने रात-रात भर जागकर दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे न्यायपूर्ण संविधान लिखा.
यह बाबा साहेब का सबसे बड़ा प्रतिशोध था! उन्होंने तलवार नहीं उठाई, उन्होंने पत्थर नहीं फेंके… उन्होंने अपनी कलम से एक ऐसा कानून लिख दिया कि अब एक दलित की बेटी और एक राजा का बेटा, दोनों एक ही कतार में खड़े होकर वोट देंगे, अपना प्रतिनिधि चुनेंगे.
उन्होंने सदियों के अंधेरे को एक ही प्रहार में खत्म कर दिया.
पर दोस्तों, इसके बाद उन्होंने एक काम और किया जिसकी लोग उम्मीद नहीं कर रहे थे.
उन्होंने 1935 में येवला सम्मेलन में घोषणा की थी, “मैं हिंदू के रूप में पैदा हुआ हूं, यह मेरे वश में नहीं था, लेकिन मैं हिंदू के रूप में मरूंगा नहीं, यह मेरे वश में है.”
और बाबा साहेब ने जीवन के आखिरी साल में हिन्दू धर्म ही छोड़ दिया!
14 अक्टूबर 1956, नागपुर की दीक्षाभूमि
पाँच लाख लोग, एक साथ, और उनके बीच बाबा साहेब, सभी ने 22 प्रतिज्ञाएं लीं और बौद्ध धर्म अपनाया.
क्योंकि बुद्ध ने कहा था, कोई नीचा नहीं, कोई ऊंचा नहीं. जन्म नहीं, कर्म इंसान को बनाता है. उस दिन इतिहास का सबसे बड़ा सामूहिक धर्मांतरण हुआ, और इसके कुछ दिनों बाद ही 6 दिसम्बर 1956 को 65 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया.
बाबा साहेब कहा करते थे, “जीवन लम्बा नहीं महान होना चाहिए!” और उन्होंने अपने जीवन से इस बात को साबित भी किया!
पर ये विडम्बना ही है कि इस महान जीवात्मा को, भारत के इस सपूत को “भारत रत्न” देने में 34 साल लग गए! 14 April 1990 के दिन उन्हें मरणोपरांत “भारत रत्न” से नवाजा गया.
दोस्तों, बाबा साहेब का जीवन हमें सिखाता है कि व्यवस्था चाहे कितनी भी ज़ालिम हो, प्रथा चाहे जितनी भी पुरानी हो, एक अकेला इंसान उसे बदल सकता है. बशर्ते बाबा साहेब की तरह उसके इरादे फौलाद के हों, और उसके दिल में अपने लोगों के लिए दर्द हो.
अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि.
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई…सबको समान लिखा है. मिटा कर भेद-भाव जाति-पाति का, बाबा साहेब ने संविधान लिखा है.
जय हिन्द, जय भीम!
बहुत-बहुतधन्यवाद.
अजय अजमेरा
फाउंडर & सीईओ
सूरत
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