Sachin Tendulkar Biography in Hindi | सचिन तेंदुलकर की जीवनी “संघर्ष से सफलता का सफर” !

16 नवम्बर, 2013. मुंबई का वानखेड़े स्टेडियम.
33,000 लोग बैठे हैं. पर फिर भी स्टेडियम में pin drop silence है
एक आदमी pitch के बीचों-बीच खड़ा है. अकेला.
वो झुकता है. उस 22 गज़ की ज़मीन को प्रणाम करता है … वो ज़मीन जो 24 साल से उसकी माँ थी, उसका मंदिर थी, उसका सब कुछ थी.
वह मिट्टी उठाता है. माथे से लगाता है. और धीरे-धीरे… pavilion की तरफ चल देता है.
और उस एक पल में…
एक बेटा भी रो रहा था और उसका बाप भी
एक बेटी भी रो रही थी और उसकी माँ भी
सड़क पर खड़ा एक सिविलयन भी रो रहा था और सरहद पर खड़ा पहरेदार भी
धर्म, जाति, क्षेत्र और राजनीति से ऊपर उठ कर एक साथ एक सौ बीस करोड़ भारतीयों की आँखें नम करने वाला वो शख्स था सचिन रमेश तेंदुलकर!
जिसके लिए क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं इबादत थी…
और उसकी इसी इबादत …इसी भक्ति ने उसे इतना महान बना दिया कि दुनिया उसे क्रिकेट का भगवान् कहने लगी!
नमस्कार दोस्तों, मैं हूँ अजय अजमेरा. स्वागत है आपका, आपके अपने ब्लॉग achhikhabar(dot)com पर.
आज की ये कहानी सिर्फ 100 centuries की कहानी नहीं है.
ये कहानी है… त्याग की, दर्द की… और उस जिद की,
जिसने मुम्बई की गलियों में खेलने वाले एक लड़के को क्रिकेट का भगवान् बना दिया.
पर शायद आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान् बनने के इस सफर की शुरुआत एक थप्पड़ से हुई थी.
उस थप्पड़ की गूँज सुनने के लिए हमें 4 दशक पीछे जाना होगा.
Chapter 1 – थप्पड़ – The Slap ( Ye Screen pe likhna hai, like Dhurandhar movie)

बांद्रा ईस्ट, मुंबई. साहित्य सहवास colony. 1980 का दशक.
एक 7 साल का शरारती बच्चा. पिता मराठी के साहित्यकार हैं, माँ LIC में काम करती हैं.
तब सचिन का मैदान था उसकी अपनी कॉलोनी…जहाँ वो रोज खिडकियों के शीशे तोड़ा करता…
और उसके घर पहुँचने से पहले उसकी शिकायत घर पहुँच जाती.
लेकिन बड़े भाई अजीत को सचिन में कुछ ख़ास नज़र आया… उन्होंने सोचा अगर इस energy को सही दिशा नहीं मिली… तो ये बर्बाद भी हो सकती है…
और तब एंट्री हुई उस द्रोणाचार्य की जो अर्जुन को संवारते हैं! कोच रमाकांत आचरेकर.
मुंबई शिवाजी पार्क में उनके under शुरू हुआ एक ऐसा routine जो आज भी inspire करता है.
सुबह 7 बजे से शाम 7 बजे तक. रोज़. दस घंटे. सिर्फ खेल को.
जब सचिन practice करते, सर उनके stumps पर एक रुपया रख देते.
कहते “जो इसे out करेगा, सिक्का उसका. अगर ये not out रहा, तो सिक्का इसका.”
सचिन ने तब ऐसे 13 सिक्के जीते!
सचिन ने एक बार कहा था- वो 13 सिक्के आज भी मेरे लिए किसी Olympic medal से कम नहीं.
उन्ही दिनों की बात है…. एक दिन सचिन के स्कूल Sharadashram Vidyamandir का match था, पर सचिन उस टीम का हिस्सा नहीं थे. उन्हें तो रमाकांत सर ने किसी और मैच में खलने को कहा था….पर सचिन अपना मैच स्किप कर स्कूल टीम का मैच देखने चले गए…. शाम को आचरेकर सर ने उनसे पूछा… “आज तुमने कैसा खेला?”
सचिन ने कहा… “सर, आज मैंने सोचा अपनी स्कूल team को cheer कर लूँ.”
बस, इतना सुनना था कि आचरेकर सर ने एक ज़ोरदार थप्पड़ मार दिया.
टिफिन बॉक्स दूर जा के गिरा. खाना ज़मीन पर बिखर गया.
और तब सर ने कहा…
“तुम्हें दूसरों के लिए चीयर नहीं करना है. ऐसा खेलो कि दुनिया तुम्हारे लिए चीयर करे.”
इस एक थप्पड़ ने सचिन के जीवन की दिशा बदल दी और अब उनका पूरा फोकस अपने खेल पर हो गया.
CHAPTER 2: मैं खेलेगा – I will play! ( screen par likhna hai)

15 नवम्बर, 1989. कराची.
16 साल का एक लड़का पहली बार देश की jersey पहन कर मैदान पर उतरा.
सामने वसीम अकरम, वकार यूनिस, इमरान खान, और अब्दुल कादिर… शायद उस समय का सबसे ख़तरनाक bowling attack.
सोचिये, जिस उम्र में लड़के लड़कियों को देख कर शर्माते हैं उस समय सचिन कितने खूंखार बॉलरो का सामना कर रहा था… और तब हेलमेट में ग्रिल भी नहीं होती थी.
पाकिस्तान में यही चर्चा थी कि क्या एक बच्चे को मरने भेज दिया….पर उन्हें क्या पता थाई कि आगे चल कर यही बच्चा उनका बाप बनने वाला है! जिसकी एक झांकी उसने सियालकोट टेस्ट में दिखा दी…
उस मैच में वकार यूनिस की एक ball सीधे सचिन की नाक पर आकर लगी. वे खून से लथपथ हो गए. नाक पर खून, जर्सी पर ख़ून, पिच पर खून!
जावेद मियादाद ने कहा, “अरे तेरा तो नाक टूट गया है, तेरे को अभी के अभी हॉस्पिटल जाना पड़ेगा!”
दोस्तों, उस समय शायद दुनिया का कोई भी और बैट्समैन होता तो, मैंदान छोड़कर चला जाता, सचिन के लिए भी सब यही सोच रहे थे… लेकिन तभी एक पतली सी आवाज़ आई…. मैं खेलेगा…मैं खेलेगा….
और वो खेला….उसने सिर्फ उस पारी में 57 रन नहीं बनाए, बल्कि वो अगले 24 सालों तक पूरे हिंदुस्तान की उम्मीदों को अपने कंधों पर लेकर खेलता रहा, और बाद में जिसके लिए खुद वकार युनिस ने कहा, “दुनिया में दो तरह के बल्लेबाज़ हैं. पहला… सचिन. दूसरा… बाकी सभी.”
दोस्तों, उस दिन सियालकोट में न भारत जीता…न पाकिस्तान जीता…लेकिन उस दिन…क्रिकेट जरूर जीत गया…
और क्रिकेट को मिल गया…एक ऐसा महान खिलाड़ी जिसके नाम की गूँज आज भी “सचिन… सचिन…” हमें रोमांचित कर देती है.
CHAPTER3: भगवान् का जन्म – The Birth of God

22 अप्रैल, 1998. शारजाह का तपता हुआ मैदान.
सामने दुनिया की सबसे ताकतवर टीम… ऑस्ट्रेलिया. और मैदान पर एक तरफ से कुदरत का कहर टूट पड़ता है. रेगिस्तान का वो भयानक रेतीला तूफ़ान… आंधी, धूल और मिट्टी का ऐसा गुबार कि इंसान को अपना हाथ न दिखाई दे.
मैदान पर सन्नाटा छा जाता है. खेल रुक जाता है. डर का माहौल है. लेकिन उस धूल के गुबार के बीच, एक साया शांति से खड़ा है. हेलमेट के पीछे वो आंखें… वो गेंद का इंतज़ार नहीं कर रही थीं, वो इतिहास लिखने का इंतज़ार कर रही थीं.
जैसे ही तूफ़ान थमा, असली डेजर्ट स्टॉर्म शुरू हुआ. लेकिन इस बार वो कुदरत की तरफ से नहीं, सचिन के बल्ले से निकला था.
सचिन ने उस मैच में 143 run बनाए और भारत को फाइनल में पहुँचाया….और ठीक दो दिन बात २४ अप्रैल 1998, को अपने बर्थडे के दिन उन्होंने 134 रन बना कर भारत को कोका कोला कप जिता दिया.
ये महज़ पारियां नहीं थी. ये उस ‘भगवान’ का उदय था, जिसकी पूजा आज हर वो बच्चा करता है जो हाथ में बल्ला थामता है.
CHAPTER 4: भगवान का दर्द – The Pain of God

19 मई 1999… इंग्लैंड में वर्ल्ड कप चल रहा था. प्रैक्टिस के बीच में मुंबई से एक फोन कॉल आता है, और एक पल में सचिन की पूरी दुनिया रुक जाती है. उनके पिताजी, प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर, अब इस दुनिया में नहीं रहे.
वही इंसान, जिन्होंने 11 साल के बच्चे से कहा था… “बेटा, सबसे पहले एक अच्छा इंसान बनो… क्योंकि एक दिन ये खले खत्म हो जायेगा… लेकिन तुम्हारी ‘अच्छाई’ अंत तक तुम्हारे साथ चलेगी.”
सचिन अपने पिताजी से बहुत अधिक attached थे….वे अन्दर तक टूट चुके थे और शायद वापस नहीं जाने का मन भी बना लिया था….
इधर जब सचिन पिता को मुखाग्नि दे रहे थे, तब इंग्लैंड में टीम इंडिया जिम्बाब्वे जैसी टीम से हार रही थी. पूरा देश सदमे में था और टीम इंडिया टूर्नामेंट से बाहर होने की कगार पर थी.
तब माँ ने अपने लाडले के कंधे पर हाथ रखा और बोलीं… “बेटा, तेरे पिताजी होते तो आज तुझे यहाँ नहीं, मैदान में तिरंगे के लिए लड़ते देखना चाहते. जाओ, खेलो… वो भी यही चाहते हैं.”
तब सचिन ने अपने आँसू पोंछे और सिर्फ 72 घंटे के अंदर वापस इंग्लैंड पहुँच गए.
मैच था केन्या के खिलाफ. सचिन ने 140 रन बना कर मैच जिताया… एक ऐसी सेंचुरी, जो सिर्फ स्कोरकार्ड पर नहीं, लोगों के दिलों में लिखी गई. जब उन्होंने अपना बल्ला आसमान की तरफ उठाया, तो पूरा स्टेडियम खड़ा था, ये सेंचुरी किसी रिकॉर्ड के लिए नहीं थी, ये एक बेटे ने अपने पिता को समर्पित की थी.
बाद में सचिन ने कहा भी था… “जब भी मैंने कुछ खास किया है, मैंने बल्ला आसमान की तरफ उठाया है… क्योंकि वो मेरे पिता के लिए होता है.”
लेकिन दोस्तों, भगवान् का दर्द यहीं ख़त्म नहीं हुआ. असली दर्द तो अभी बाकी था.
2004 में सचिन को टेनिस एल्बो से जूझ रहे थे. वो हाथ, जिससे दुनिया के सबसे खतरनाक गेंदबाज़ डरते थे, अब एक कप उठाने में भी दर्द महसूस करता था. रातें पेनकिलर्स के सहारे गुजरती थीं, और क्रिकेट का भगवान करुणा निधान से प्रार्थना कर रहा था… “हे भगवान, मेरा करियर इस तरह ख़त्म मत करना.”
सचिन किसी तरह इस दर्द से उभरते हैं, पर फॉर्म पाने के लिए उनका स्ट्रगल जारी रहता है…और इसी बीच टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक हेडलाइन छपती है… “ENDULKAR.”
यानी अब तेंदुलकर खत्म हो चुका है.
सचिन अपनी ऑटोबायोग्राफी Playing It My Way में लिखते हैं – इस हैडलाइन ने मुझे अन्दर तक झकझोर दिया था…और मैं रिटायरमेंट की सोचने लगा था.
सचिन अभी इस आघात से उभर भी नहीं पाए थे कि एक और ऐसी घटना घटी….जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था.
सचिन अपने ही घर, अपने ही मंदिर… वानखेड़े स्टेडियम में खेलने उतरे.
वही मैदान जहाँ उन्होंने अपने सपनों को पंख दिए थे, जहाँ उन्होंने अपना खून-पसीना बहाया था. और जो मैदान कभी “सचिन-सचिन” कहने में थकता नहीं था… उसी मैदान में जब सचिन एक टेस्ट मैच में सिर्फ एक रन पर आउट हो गए तो आवाज़ आई… “सचिन हाय-हाय. सचिन हाय-हाय.”
जी हाँ, उन्हीं लोगों ने, जिन्हें सचिन ने 20 सालों तक खुशियाँ ही खुशियाँ दी थीं, वही लोग आज उनके खिलाफ खड़े थे.
वो शोर सचिन के जहन में गूंज रहा था. और उस दिन सिर्फ एक खिलाड़ी नहीं टूटा था… उस दिन एक भगवान भी रोया था.
CHAPTER 5: ज़वाब – The Answer

जब दुनिया किसी आम इंसान कि आलोचना करती है तो वो अपने मुंह से जवाब देता है, लेकिन जब एक महान खिलाड़ी पर उँगलियाँ उठाई जाती हैं तो वो जवाब अपने खेल से देता है!
सचिन ने अपने आलोचकों को एक भी शब्द नहीं बोला.
वो चुपचाप मैदान में उतरे. और बल्ले से जवाब देना शुरू किया….एक के बाद एक कई शानदार इन्निंग्स खेलीं….रिकार्ड्स का अम्बार खड़ा कर दिया और
24 फरवरी, 2010. को ग्वालियर में South Africa के खिलाफ एक ऐसी पारी खेली कि चार साल पहले
“Endulkar” छापने वाले Times of India को एक नयी headline छापनी पड़ी…
“Sachin Tendulkar becomes the first batsman in cricket history to score a double century in an ODI.”
200 रन. 147 balls. One Day International में पहला दोहरा शतक. इतिहास में पहली बार.
जो paper उन्हें खत्म बता रहा था… उसी paper ने उनके तारीफ की झड़ी लगा दी!
पर इन सबके बावजूद एक चीज की कमी सचिन और उनके फैन्स को खल रही थी…. रिकॉर्ड बुक सचिन के कारनामो से भरी हुई थी पर उनके नाम अभी भी कोई World cup नहीं था!
2011 वर्ल्ड कप के हर मैच में सचिन ने अपना बेस्ट दिया, दो शतक, दो अर्ध शतक लगाये…. सेमिफिनल में पकिस्तान के खिलाफ 85 रनों की मैच विन्निंग पारी खेली और Man of the Match बने.
और फिर आया वो दिन. जिसका 22 साल से खुद सचिन भी इंतज़ार कर रहे थे!
2 अप्रैल, 2011. वानखेड़े. World Cup Final. India vs Sri Lanka.
India ने 28 साल बाद World Cup जीत लिया.
और उस रात वो पल आया… जो शायद क्रिकेट इतिहास का सबसे emotional पल है.
पूरी Indian team सचिन को कंधों पर उठा कर stadium का चक्कर लगा रही है.
22 साल का वो भारी बोझ… जो 16 साल के एक बच्चे के कन्धों पर कभी रखा गया था… वो बोझ उस रात उतरा.
Virat Kohli, जो तब नए-नए team में आये थे… उन्होंने वो लाइन कही जो अमर हो गयी…
“सचिन ने 21 साल तक इस देश की उम्मीदों का बोझ उठाया है. अब वक़्त आ गया है कि हम उन्हें अपने कंधों पर उठाएँ.”
और उस पल में…
सचिन युवराज सिंह को गले लगाकर फूट-फूट कर रो पड़े.
CHAPTER 6: आखिरी सलाम – The Last Match

16 नवम्बर, 2013.
सचिन का 200वाँ और आखिरी test match. West Indies के खिलाफ.
74 रन बना कर Out हो जाते हैं. भारत वो मैच एक पारी और 126 .रनों से जीत जाता है.
और फिर वो mic के सामने आते हैं.
कहते हैं… “आज life में पहली बार मैं list लेकर आया हूँ. डर है कहीं किसी का नाम भूल न जाऊं.”
और फिर वो नाम लेते हैं.
पिता का. माँ का. भाई अजीत का. आचरेकर सर का.
और फिर अंजलि का.
वो अंजलि… जो gold medalist doctor थीं. जिनके सामने पूरा career था.
सचिन कहते हैं… “जब हमने family बनाने की सोची, अंजलि ने कहा… ‘तुम खेलो. परिवार मैं सम्भाल लूँगी.’ उनके बिना मैं free होकर क्रिकेट नहीं खेल पाता. तुम मेरे जीवन की सबसे अच्छी partnership हो.”
सबको धन्यवाद करने के बाद सचिन ने वो आख़िरी लाइन कही…
“ये वक़्त बहुत तेज़ी से गुज़र गया. पर जो यादें आपने मुझे दीं, वो हमेशा मेरे साथ रहेंगी.”
“ख़ास तौर पर… ‘स..चिन… स..चिन…’… ये चीख तब तक मेरे कानों में गूँजती रहेगी, जब तक मैं सांसें लेना बंद नहीं कर देता.”
और फिर वो अकेले, मैदान के बीच में गए. 22 गज़ की उस pitch को प्रणाम किया. मिट्टी माथे से लगायी.
और धीरे-धीरे pavilion की तरफ चल दिए.
और उस पल में, एक सौ बीस करोड़ लोग रो पड़े.
क्योंकि वो सिर्फ एक cricketer नहीं जा रहा था.
100 अंतरराष्ट्रीय शतक, 200 टेस्ट मैच और 34,000 से ज़्यादा रन वाली एक रिकॉर्ड बुक जा रही थी!
एक दौर जा रहा था. एक युग जा रहा था. एक भारत रत्न जा रहा था…और सबसे बढ़कर क्रिकेट का भगवान जा रहा था.
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आज अपना क़ीमती वक़्त देने के लिए… बहुत-बहुत धन्यवाद.
जय हिन्द, जय भारत.
बहुत-बहुतधन्यवाद.
अजय अजमेरा
फाउंडर & सीईओ
सूरत
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