भारत के 20 महान भक्त और उनकी चौंकाने वाली कहानियाँ | 20 Greatest Devotees of India

संत-महात्माओं की भूमि “भारत” एक महान देश है. यहाँ आस्था और और श्रद्धा लोगों की रग रग में बहती है. जाती और वर्ण अनुसार, जन्म से ले कर मरण तक, हर एक अवसर के लिए, यहाँ “अनोखी परंपराएं” बनी हुई है, जिनका आधार है, हमारे धार्मिक ग्रंथ, पूर्वजों के लिखे दस्तावेज, उनके अनुभव, परमात्मा पे उनकी अटूट श्रद्धा और उनकी दैवीय मान्यताएं.
आज नई पीढ़ी भले ही सोशल मीडिया, करियर और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से घिरी नज़र आए, लेकिन प्राथना, श्रद्धा और धार्मिक मान्यताओं से वे भी अछूते नहीं हैं, तो पेश है 20 भक्त… 20 कहानियाँ… 20 Greatest Devotees of India जिन्होंने अपनी अनन्य भक्ति और श्रद्धा के दम पर, भगवान् को उनपर “कृपा-दृष्टि” डालने पर मजबूर कर दिया था.
रानी द्रौपदी का भगवान् कृष्ण में अटूट विश्वास
इंद्रप्रस्थ महल में जब दुर्योधन पानी के कुंड में गिरा, तो पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने उसे “अंधे का पुत्र अँधा…” कह कर ठिठोली की, फिर शकुनि की मदद से दुर्योधन ने चौसर का कपट खेल किया, जिसमें पांडव द्रौपदी हारे, भरी सभा में उसका चिर हरण होने लगा, वहां एक से बढ़ कर एक महाबली थे, कोई सहायता को उठने की हिम्मत न कर सका, स्वयं द्रौपदी भी, जब तक अपने दांतों तले पल्लू दबाए झुझ रही थी, तो सहायता नहीं हुई, लेकिन जैसे ही उसने अपने आपको श्री कृष्ण की शरण में कर दिया, चक्रधर सिंघासन से उठे और द्रौपदी की लाज बचाई.
जलाराम बापा का पत्नी दान

गुजरात राज्य में जलाराम सदाव्रत करते थे. उनके वहां किसी भी भदेभाव के बिना, सब को भोजन कराया जाता था, एक बार स्वयं भगवान साधु रूप में उनकी उदारता की परीक्षा करने धरती पर उतर आए, उन्होंने सेवा-कार्य हेतु जलाराम की पत्नी को दान में मांग लिया, उस घड़ी जलाबापा ने बिना किसी संकोच, अपनी पत्नी “वीरबाई” को दान कर दिया.
फिर ईश्वर ने अपने असली रूप में प्रकट हो कर, उन्हें आशीर्वाद दिया. उस दिन से आजतक जलाराम के धाम पर परोपकार और भोजन कराने की परंपरा जारी है, वहां कभी अन्न की कमी नहीं होती.
प्रेमानंद महाराज की “हरी भक्ति”
देश-विदेश में बसे बड़े बड़े सेलेब्रिटी इनके भक्त है, लेकिन खुद प्रेमानंद महाराज कृष्ण-भक्ति में मगन रहते हैं, एक बार वे घंटो तक कृष्ण भजन में लीन हो गए, आसपास बैठे लोग भी इतने भावुक हो गए की उनकी आँखों से आंसू बहने लगे.
प्रेमानंद महाराज से जुड़ी यह घटना सिखाती है कि एक सच्चा भक्त जब सब कुछ भूल कर, अपने आराध्य को भजता है तो उसके समूल कष्ट नाश हो जाते हैं. कोई चिंता, कोई दुविधा उसे व्यथित नहीं कर पाती.
चैतन्य महाप्रभु और पूरी की “रथ यात्रा”
इनकी कृष्ण भक्ति इतनी गहरी थी की, “पूरी” में रथयात्रा के दौरान वे सुधबुध भूल जाते, कभी नाचने लगते, कभी नृत्य करते, कभी ज़मीन पर लेट कर हर्ष और उल्लास के साथ “हरे क्रिष्णा” का जाप करने लगते. उनकी भक्ति का प्रभाव इतना गहरा था कि, आसपास के लोग भी उनका अनुसरण करते और पूरा माहौल भक्तिमयी बन जाता था.
उनकी भक्ति शब्दों की सिमेओं से परे, उनकी अन्तरात्मा में बसी हुई थी. इसी लिए उन्होंने लाखो लोगों को आस्था के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया.
भक्त प्रह्लाद और नरसिंह अवतार

कहते हैं, जिसे कोई नहीं पहुँच पाता, उसे उसका पेट पहुँचता है. हिरण्यकश्यप चाहता था, सारा संसार उसे भगवान मान कर उसकी ही पूजा करे, लेकिन उसी का पुत्र प्रह्लाद परम विष्णु भक्त हुआ. उसे समझाने और डराने के लिये हिरण्यकश्यप ने ज़मीन आसमान एक किए, लेकिन भक्त प्रह्लाद नहीं माना.
उसे पहाड़ से गिराया गया, ज़हर दिया गया, आग में बैठाया गया, लेकिन हर बार विष्णु भगवान ने उनकी रक्षा की. अंत में खंभे से नरसिंह रूप में विष्णु प्रकट हुए और
हिरण्यकश्यप का वध किया, इस दिव्य प्रसंग का सार यह है कि, अटूट श्रद्धा होगी तो ईश्वर प्रकट होंगे और कष्ट दूर भी करेंगे.
भीष्म से बड़ा कोई पितृभक्त नहीं !
हस्तिनापुर का यूवराज जब ये जानता है कि उसके पिता किसी कन्या पर मोहित है, और उस कन्या का पिता चाहता है कि उसकी बेटी का पुत्र राजा बने, तो एक ही क्षण में यूवराज पद त्याग दिया, भविष्य में कलह न हो इस लिए वंशहीन रहने का प्रण किया, राष्ट्र की सीमाएं सुरक्षित रहे इस लिए हस्तिनापुर के सभी राजा में अपने पिता की छवि देख् कर उनकी सेवा और राष्ट्र रक्षा का वचन दे दिया.
फिर जब इच्छा-मृत्यु का वरदान मिला तो, तब तक प्राण नहीं त्यागे, जब तक चहुओर से हस्तिनापुर सुरक्षित नहीं हुआ, यह सब किया, क्यूँ की भीष्म अपने पिता को सुख देने चाहते थे. पुत्र का कर्त्तव्य क्या है, उसे कैसे जीवन बिताना चाहिए यह भीष्म की कथा सिखाती है.
कबीरदास की आलोचना
कबीर दास जब काशी में एक बुनकर के तौरपर काम करते थे, तो उनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी, लेकिन वे भगवान में अटूट श्रद्धा रखते थे, सदैव नाम जपते और अपना काम करते.
यह सब देख् कर कुछ लोग उनका मजाक उड़ाने लगे, वे बोले, अगर सच में भगवान है तो तुम्हारी गरीबी दूर क्यों नहीं कर देते !
तब कबीरदास कहते हैं, भगवान मदद करने नहीं, मार्ग दिखाने आते हैं और जो ईश्वर के असल स्वरूप को जान लेते हैं, उन्हें द्वेष, इर्षा, लोभ, मोह, माया और अशांति जैसे भाव व्यथा नहीं दे सकते.
आलोचना करने वालों को तुरंत अपनी भूल का एहसास हुआ, फिर उन्होंने कभी संत कबीरदास की भक्ति पर सवाल नहीं किया.
बालक ध्रुव की घोर “विष्णु तपस्या”

ध्रुव को बाल्यकाल से ही पिता का साया नहीं मिला, इस बात से वह बेहद दुःखी था, 5 वर्ष की आयु में ही वो वन चला जाता है, फिर कठोर विष्णु तपस्या करता है.
उनकी इस साधना की चर्चा तीनों लोको में होने लगती है, अंततः विष्णु भगवान प्रकट होते हैं और आकाश में “ध्रुव तारा” (स्थिर तारा) बन कर सदैव चमकने का वरदान देते हैं.
ध्रुव की कहानी सिखाती है कि जीवन में सब लोगों को सभी सुख सुविधाएं नहीं मिलती, लेकिन अटूट श्रद्धा और तपस्या आपको वो दिला सकती है जो किसी को न मिला हो.
यम अवतार विदुर महाराज का कृष्ण प्रेम
पांडवों और कौरवों में युद्ध होने वाला था, लेकिन कृष्ण भगवान शांति प्रस्ताव लिए हस्तिनापुर आए, वे जानते थे हठी दुर्योधन नहीं मानेगा, इस लिऐ राजभवन में भोजन करने का तो सवाल ही नहीं बनता था,
विदुर महाराज कृष्ण भक्त थे, वे उन्हें भोजन के लिए अपने घर ले जाते हैं. विदुर अत्यंत साधारण जीवन जीते थे, उनके घर पर स्वयं भगवान भोजन को पधारे हैं, इस बात से वे इतने हर्षित हो गए की, फल फेंकते गए और उनके छीलके प्रभु को खिलाने लगे. भगवान् वो भी खाने लगे.
भगवान् ने उनका स्नेह देखा, भोजन की गुणवत्ता नहीं, इस प्रसंग से सीख मिलती है कि, ईश्वर कीमती चढ़ावे के भूखे नहीं, वे बस आपका प्रेम और भाव देखते हैं.
वीर हनुमान की अटूट श्रद्धा

रामजी की सेना जब लंका में पहुंची, तब रावण पुत्र मेघनाद और लक्ष्मण के बीछ भयंकर युद्ध हुआ, मायावी मेघनाद ने बरछी मारी, लक्ष्मण के प्राण संकट में थे, तब पहले तो हनुमान लंका नगरी से वैद सुषेण को उठा लाए, फिर लक्ष्मण जी के लिऐ हिमालय से संजीवनी ले आए.
यह कार्य एक ही रात में करना था, मार्ग में अनेक बाधाएं थी, ऊपर से हनुमानजी संजीवनी बूटी को पहचानते भी नहीं थे. फिर भी वे श्रीराम का नाम ले कर निकल पड़े, एक के बाद एक सभी बाधाएं टल गई और लक्ष्मण के प्राण भी बच गए. इस धार्मिक प्रसंग से सीख मिलती है कि श्रद्धा और हिम्मत से सभी रास्ते खुल सकते हैं, हनुमान जी सफल हुए क्यूँ की उनके मन में श्रीराम की कृपा को ले कर तिनका भर भी शंका नहीं थी.
भक्त रामदास का ऋण ईश्वर ने चुकाया
अटूट श्रद्धा और भगवान पर विश्वास चमत्कार कर सकता है. रामदास श्रीराम के बहुत बड़े भक्त थे. एक बार भद्राचलम में राम मंदिर निर्माण के लिए उन्होंने सरकारी खजाने का धन खर्च कर दिया. उनकी आस्था सच्ची थी, लेकिन राज्य नियमावली अनुसार वे अपराधी बने.
नगर के राजा ने फ़ौरन उन्हें कारागार में डाल दिया. इस विपत्ति के समय में भी रामदास की श्रद्धा अडिंग रही, वे राम नाम जपते रहे.
कहा जाता है कि उनके भक्तिभाव से प्रसन्न हो कर भगवान राम और लक्ष्मण राजा के पास गए और सोने के सिक्के दे कर भुगतान किया और रामदास को मुक्त कराया. यह कहानी अटूट विश्वास और और सच्ची भक्ति का महात्मय दर्शाती है.
अर्जुन ने जब “नारायणी सेना” तक ठुकरा दी !
अर्जुन का क्रॉध अग्नि समान था. उसका बाहुबल भी अद्वितीय था, उसके पास ब्रह्माण्ड के सभी दिव्यास्त्र थे, वो चाहता तो एक क्षण में कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त कर देता, लेकिन उसने कभी कृष्ण भगवान की आज्ञा का अनादर नहीं किया,
जब तक कान्हा ने शांति रखने को कहा तो शांति रखी. युद्ध के मैदान में स्वजनों को देख् मन निर्बल हुआ तो भी, कर्म नहीं त्यागा, धनुष उठा लिया, क्यूँ की कृष्ण ने कहा था.
युद्ध में जाने से पूर्व नारायणी सेना मिल सकती थी, फिर भी अर्जुन ने निहत्थे कृष्ण को चुना, इसी बात से पता चलता है कि वे कितने बड़े श्रीकृष्ण भक्त थे, उनकी इसी श्रद्धा और धर्म की डोर ने उन्हें विजय श्री दिलाई,
शत्रु पक्ष में कोई अमर था, तो किसी की पराजय असंभव थी, किसी के पास दिव्यास्त्र था, तो कोई वज्र का था, सब परास्त हुए, क्यूँ की अर्जुन के पक्ष में कृष्ण भगवान थे, और वो सिर्फ धर्म के साथ होते हैं. संदेश बहुत सरल है, विजय होना है तो धर्म की ड़ोर मत छोड़ो.
तुलसीदास को पत्नी का ताना
तुलसीदास एक महान भक्त और कवि थे. उनकी भक्ति से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग है. एक समय वे अपनी पत्नी के प्रति अत्याधिक आसक्त हुए,
अब उनकी भारिया मायके गई थी. उससे मिलने के लिए वे जान जोखिम में डाल कर खतरनाक रास्तों पर अकेले चल पड़े. जब यह बात उनकी पत्नी को पता चली, तो वह बोल पड़ी,
“जितना प्रेम तुम इस नश्वर शरीर से करते हो, यदि उसका आधा भी भगवान राम से करते, तो तुम्हारा जीवन आज सफल हो जाता”
यह बात तुलसीदास को अच्छे से समझ आ गई, उसी क्षण उनका सांसारिक मोह भंग हुआ, और वे राम-भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ गए. आगे चल कर उन्होंने “रामचरितमानस” जैसे महान ग्रंथ की रचना की.
रैदास का संदेश
वे रविदास के नाम से भी जाने जाते थे. एक बार नगर के राजा ने उन्हें गंगा स्नान के लिए बुलाया, परंतु रैदास ने कहा, मैं अपना काम (जूता बनाना) को नहीं छोड़ सकता.
ये कह कर, उन्होंने श्रद्धा से एक कटोरे में पानी लिया और भगवान का स्मरण किया, तभी चमत्कार हुआ और वही जल गंगा के समान पवित्र माना गया.
मन की सच्चाई, समानता और सेवा के हिमायती रविदास से जुड़ा यह प्रसंग सिखाता है कि शुद्ध ह्रदय से ईश्वर को याद किया जाए तो, स्थान का महत्त्व नहीं रह जाता, क्यूँ की ईश्वर तो सर्वत्र जगहों पर है. इस तरह रविदास ने समाज को भक्ति और सरल जीवन का संदेश दिया.
शबरी की राम भक्ति

रामायण की कथा अनुसार, श्रीराम की भक्त शबरी उनके दर्शन के लिए बरसों तक इंतज़ार करती है, वो उनके स्वागत के लिए रोज़ राहों पर ताज़े फूल बिछाती और उनके लिए मीठे बेर चुनती थी.
जिस दिन राम उनके सामने आए, उसने एक एक बेर चख कर, यह सुनिश्चित किया कि वे मीठे हो, परम कृपालु श्री राम ने जूठे बेर भी खाए, क्यूँ की उन्होंने शबरी का प्रेम और मन का भक्तिभाव देखा,
यह प्रसंग सिखाता है कि भगवान को कभी बाहरी आडंबर पसंद नहीं आते, वे अपने भक्तों को श्रद्धा और प्रीत के तराज़ू में तौलते हैं.
सुदामा की भयंकर भूल और भगवान् की उदारता !
कहा जाता है, एक बार जंगल में लकड़ियां काटने जाते समय, गुरुमाता कृष्ण और सुदामा को चने की पोटली देती हैं, रास्ते में तूफ़ान आया, तब कृष्ण और सुदामा अलग अलग पेड़ पर चढ़ गए, रात में सुदामा को बड़ी भूख लगी, तब वो अपने हिस्से और भगवान कृष्ण के हिस्से के भी चने खा गया, इस तरह उसको दरिद्र योग हुआ.
समय का चक्र आगे बढ़ गया, कृष्ण भगवान द्वारिका आ गए, सुदामा अपनी ग्रहस्ती में व्यस्त हुए, सुदामा गरीबी से बेहाल थे, उनकी पत्नी उन्हें मदद लेने के लिए, कृष्ण भगवान के पास भेजती है. साथ में थोड़ा चिवड़ा (पोहा) भेजती है.
सुदामा का नाम सुनते ही, कृष्ण राजमहल से बाहर दौड़ आते हैं, वो बिना कहे अपने मित्र की स्थिति जान लेते हैं. लाड़ के साथ चिवड़ा भी खाते हैं. ख़ुद्दार सुदामा अपनी हालत के बारे में एक शब्द नहीं कहता.
लेकिन जब वो लौट कर घर आता है तो देखता है, की उसकी जोपड़ी महल बन चुकी थी, उसके सारे कष्ट समाप्त हो चुके थे.
इस धार्मिक कथा का सार यह है कि, ईश्वर को अर्पण किए बिना अन्न नहीं खाना चाहिए और दूसरी बात यह की भगवान से कुछ मांगने की जरुरत नहीं होती, उन्हें सब पता है, समय आने पर वो आपके सभी कष्ट स्वयम हर लेते हैं.
मीराबाई का संपूर्ण समपर्ण
संत-कवयित्री मीराबाई का पूरा जीवन श्री कृष्ण को समर्पित था. उनके इस व्यवहार से उनका परिवार बेहद नाराज़ था.
उन्होंने एक बार तो विष का प्याला भेज दिया, तब मीराबाई ने उसे कृष्ण का प्रसाद मान कर पी लिया, कृष्ण कृपा से उनपर ज़हर का कोई असर नहीं हुआ.
इस दिव्य प्रसंग का सार यह है कि सच्ची भक्ति, निष्कपट प्रेम, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण ही परमात्मा के करीब ले जाता है.
नरसिंह मेहता का कर्ज
“वैष्णव जन तो तेने कहिये” की रचना करने वाले नरसिंह मेहता गुजरात के निवासी थे, वे बहुत बड़े कृष्णभक्त थे.
एक समय उन पर बहुत कर्ज हो गया, साहूकार ने पैसे मांगे, तब वे बोले सांवरिया सेठ मेरा कर्ज चुकायेगा. विपत्ति के समय नरसिंह मेहता ने पूरी श्रद्धा से कृष्ण का स्मरण किया.
तब एक अजनबी व्यक्ति साहूकार के पास पहुँचता है और उनका सारा कर्ज अदा कर देता है. धार्मिक मान्यता है की वह स्वयं भगवान कृष्ण थे, जो अपने भक्त की सहायता के लिए आए थे.
सूरदास को राह दिखाई !

नेत्रहीन होने के बाद भी सूरदास मन की आँखों से निरंतर कृष्ण भगवान के दिव्य स्वरूप को निहारते रहते थे.
उनकी अंतरदृष्टि इतनी प्रबल थी कि उन्होंने कृष्ण की बाल लीलाओं का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है, उनकी प्रसिद्ध रचना “सूरसागर” बहुत लोकप्रिय हुई.
कहा जाता है कि, जब एक बार सूरदास अपने मार्ग से भटक गए, तब एक मासूम बालक आ कर उनकी ऊँगली थाम कर, उन्हें सही राह पहुंचा देता है,
वह बालक कोई और नहीं स्वयं कृष्ण भगवान थे, यह बात जब अंध कवि सूरदास को पता चलती गई तो वे भाव-विभोर हो गए.
जीवन की भागदौड़ में हम भी कई बार अपने आपको निःसहाय अकेला और भटका हुआ पाते हैं, ऐसे में धैर्य धारण करना चाहिए, जैसे प्रभु ने सूरदास का पथ प्रदशित किया हमारा भी कर देंगे.
गुरु नानक का “सच्चा सौदा”
मानवता को सेवा, समानता और प्रेम की सीख देने वाले गुरु नानक देव सिख धर्म के संस्थापक और महान संत थे.
उनकी भक्ति से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग है. एक बार उनके पिता व्यापार हेतु कुछ पूंजी देते हैं. परंतु गुरु नानक वह सारा धन भूखे और ज़रूरतमंद लोगों को भोजन कराने में खर्च देते हैं.
जब उनके पिता ऐसा करने का कारण पूछते हैं तो वे इसे “सच्चा सौदा” बताते हैं. मतलब दुखियारों की सेवा करना ही जीवन का सब से बड़ा लाभ है.
गुरु नानक का परोपकारी जीवन हमें सिखाता है कि प्रेम, दया और सेवा ही ईश्वर तक पहुँचने का उत्तम मार्ग है.
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