गुड़ी पड़वा 2026: इतिहास, मान्यता और पूजा करने की विधि | gudi padwa festival hindi

भारतवर्ष विभिन्न सभ्यताओं को अपने में समेटे हुए है. इस विशाल राष्ट्र में हर प्रकार के धर्म-मजहब और पंथ में आस्था रखने वालों के लिए जगह है. यहाँ तक की जिन्होंने पूर्वकाल में इस देश पर आक्रमण किया था, उनमें से भी कुछ लोग यहीं बस गए. हिन्दू-समाज सहिष्णुता परोपकार और प्रेमभाव का प्रतिक है. छत्रपति शिवाजी महाराज की भूमि महाराष्ट्र में “गुड़ी पड़वा” पर्व का गहरा महत्त्व है. यह पर्व हिंदू नववर्ष, वसंत ऋतु के आगमन और नई शुरुआत का प्रतीक कहा गया है. इसे खुशहाली, विजय और सुख शांति समृद्धि के आरंभ का दिन भी कहा गया है. क्यूँ की इसी दिन परम-पिता ब्रह्माजी ने श्रुष्टि की रचना आरंभ की. गोवा और महाराष्ट्र में तो Gudi Padwa Festival धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन देश दुनियांभर में बसे मराठी और कोंकणी लोग भी इस दिन को सेलेब्रेट करते हैं. आइए gudi padwa festival hindi विषय पर और जानकारी प्राप्त करें.
गुड़ी पड़वा पूजा का मंत्र जान लीजिए
गुड़ी पड़वा के दिवस पर “ॐ ब्रह्मणे नमः” तथा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना लाभदायक होता है.
# मंत्रोच्चार और स्तुति के लाभ
मन को शांति मिलेगी.
कष्ट दूर होंगे.
सकारात्मक माहौल बनेगा.
ईश्वर की कृपा होगी.
सुख समृद्धि आएगी.
तनाव और दुख दूर होगा.
गुड़ी की स्थापना विधि Install Gudi
सामग्री :
रेशमी कपड़ा, बांस की छड़ी, नीम के पत्ते, ताजे फूल की माला, एक मिश्री का टुकड़ा (अन्य सजावट सामान सुविधा अनुसार : मोती, शीशे या और कुछ)
प्रक्रिया :
5-6 फीट लंबी और 1-2 इंच चौड़ी बांस छड़ी लेलें, कांच कागज़ (सेंड पेपर) से घिस कर छड़ को चिकना बना लें. ताकि वो पॉलिश्ड दिखे.
1.5*3 Feet लंबा चमकीला रेशमी कपड़ा छड़ी के ऊपरी भाग में बांध दें. 6″ खाली कपड़ा छोड़ कर पूरा कपड़ा लपेट लेना है.
अगले चरण में, बांस के ऊपरी भाग पर नीम पत्ते, आम के पत्ते और फूल माला को बांधना है.
बांस के ऊपरी भाग में ही नीम के पत्तों के ऊपर मिश्री का बड़ा सा टुकड़ा लगा कर सुरक्षित कर देना है.
स्थान :
तैयार हुई गुड़ी को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर किसी खिड़की या बालकनी में लगा सकते हैं. जगह ऐसी हो की लोगों की नजर उस पर पड़े. बस इतना ख्याल रखें कि गुडी की ऊंचाई सामान्य व्यक्ति की height से थोड़ी अधिक ही रहे.
भोग-प्रसादी :
श्रीखंड, पूड़ी सब्जी, आम रस, दाल, चटनी, निम्बू, कटलेट इतियादी का थाल… (प्रसाद : इमली, धनिया, नीम पत्ती और गुड़ का मिश्रण)

गुड़ी पड़वा पूजा की सरल विधि
महाराष्टा और अन्य क्षेत्रों में श्रद्धा भाव से मनाए जाने वाले इस पर्व के दिन घर स्वच्छ करना होता है. उसके बाद घर के आंगन में रंगोली सजाते हैं.
सूर्योदय से पहले ही स्नान करना होता है. इस दिन साफ़ सुथरे नए कपड़े पहनते हैं. फिर ब्रह्माजी की पूजा का विधान है. उसके बाद लंबी लकड़ी या बांस लेना होता है.
उसके ऊपर रेशमी कपड़ा बाँधना होता है. इसके ऊपर फूल माला, निम पत्तियां, आम की पत्तियां वगेरह जोड़े जाते हैं. इन सब के ऊपर तांबे या चांदी का उल्टा कलश लगाया जाता है.
इस तरह “गुड़ी” तैयार होती है. तैयार हुई गुड़ी को घर की खिड़की या दरवाजे पर ऊपर की और लगाया जाता है.
फिर भगवान् की आरती होती है. अंत में गुड़, नीम पत्ती और अन्य प्रसाद-भोग को ग्रहण किया जाता है.
गुड़ी पड़वा पूजा का महात्मय
मानव का स्वभाव है, दुःख और कष्ट में ईश्वर अधिक याद आते हैं, लेकिन जब धन-दौलत और सफलता मिलती है तो अपने संघष की कहानियां बताना और चातुर्य की बढ़ाई करना अच्छा लगता है.
गुड़ी पड़वा पूजा, श्रद्धालु इस आस्था को ध्यान में रख कर करते हैं कि उनके घर पर खुशहाली, सुख समृद्धि और शांति का आगमन हो.
गुड़ी पड़वा की कब शरुआत हुई थी
हिंदू पंचांग के अनुसार “चैत्र मास” के “शुक्ल पक्ष” की प्रतिपदा तिथि को भगवान ब्रह्मा जी ने इस सृष्टि का निर्माण शुरू किया. इसी कारण ये हिंदू नववर्ष का प्रथम दिन कहा गया है.
कहते हैं इसी दिन से समय, ग्रह-नक्षत्र और प्रकृति के चक्र का आरंभ हुआ. इस शुभ दिन को समृद्धि और विजय का प्रतीक भी कहा गया है.
गुड़ी पड़वा के दिन क्या क्या “ना करें”
वैसे तो हर दिन अच्छा व्यवहार करना चाहिए. लेकिन गुड़ी पड़वा वर्ष की शुरुआत का दिन माना गया है तो, इस दिन कलेश-जगड़ा ना करें.
पुराने बैर और खटराग का त्याग करें, घर को धूमिल या अस्वच्छ ना रखें, देर तक न सोएं, बिना नहाए भोजन और पूजा कतय ना करें, जूठ न बोलें, किसी का अपमान न करें, अखाज (मांस आहार) और नशे की चीज़ों से दूरी रखें.

मुगल आक्रांता औरंगजेब पर शिवाजी महाराज की विजय
वर्ष 1967 में शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को बुरी तरह हरा दिया. उस दिन (गुड़ी पड़वा) पर विजय की ख़ुशी प्रकट करते हुए, रायगढ़ किले पर केसरिया ध्वज फहराया गया.
जिसे गुड़ी के नाम से पहचाना जाता था. उसी समय से वहां ध्वज फहराने की परंपरा अस्त्तिव में आई.
मराठी राजा शालिवाहन (सातवाहन) की कथा
एक लोककथा अनुसार, राजा शालिवाहन ने मिट्टी के सैनिकों की सेना तैयार की, फिर मंत्रोच्चार के साथ उसपर पानी छिड़का, ऐसा करने से सेना जिवंत हो उठी. इसी चमत्कारी सेना की सहायता से उन्होंने शक (शक्तिशाली शत्रु सेना) को हरा दिया.
इस तरह मराठी साम्राज्य का विस्तार हुआ. कहते हैं कि सम्राट शालिवाहन देवी के उपासक थे और उन्हें पूजा के उपरांत एक शॉल भेंट करते थे.
सात चक्रों में आस्था रखने की वजह से इस राजा को शतवाहन कहा जाता था. लेकिन समय बीतने के साथ उनका नाम “शालिवाहन” हो गया. उनके राज्य का प्रतिक गुड़ी हुआ करता था.
(विस्तार : झंडा, और उसके ऊपर एक विशेष आकार का घड़ा, जो कुंडलिनी का प्रतिनिधित्व करता था. इस तरह वे (शालीवाहन) कुंडलिनी के उपासक थे.
भगवान् श्रीराम और बाली की कथा
त्रेता युग में सुग्रीव और बाली नाम के दो बलशाली वानर हुआ करते थे. बाली बड़ा था, उसने एक बार राक्षस रावण को भी बंदी बना कर ब्रह्मांड में घुमा दिया था.
एक बार किसी अन्य राक्षस से युद्ध के दौरान अपने भाई सुग्रीव से मतभेद हुआ, तब बाली ने अनैतिक तरीके से छोटे भाई सुग्रीव को देश निकाला दे दिया और उसकी भारिया को रख लिया, श्रीराम और लक्षमण जब सीता माँ की खोज में निकले.
तब सुग्रीव से उनकी भेंट हुई, फिर श्री राम ने मित्रता की खातिर, सुग्रीव के कष्ट दूर करते हुए, अत्याचारी वानर-राजा “बाली” का वध किया.
इस तरह दक्षणि की प्रजा भी बाली के प्रकोप से मुक्त हो गई, अपनी खुशी व्यक्त करते हुए तब प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां) फहराए थे.

Lesser Known Facts (गुड़ी पड़वा)
हिंदु धर्म में आस्था रखने वाले लोग पुरे साल में साढ़े तीन मुहूर्त शुभ माने जाते हैं. जिसमें दीवाली आधा और गुड़ी पड़वा, अक्षय तृतीया तथा दशहरा पूर्ण शुभ मुहूर्त माने जाता है.
गुड़ी पड़वा एकता और मित्रता को बढ़ावा देने का भी पर्व है. मित्र, परिवार जन और आसपास रहने वाले सब लोग मिल कर इस दिन खुशियां और आनद साझा करते हैं.
देश में किसानों द्वारा, इस दिन को “रबी की फसल” के अंत और नई फसल के मौसम की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है. किसान इस खास दिन अगली फसल के लिए अपने खेतों की जुताई भी करते हैं.
Q : गुड़ी पड़वा क्यों मनाया जाता है?
A : यह पर्व हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। गुड़ी पड़वा वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल की खुशी में मनाया जाता है.
Q : गुड़ी पड़वा का क्या अर्थ है?
A : “गुड़ी” का अर्थ विजय ध्वज या पताका होता है और “पड़वा” का अर्थ चंद्र मास का प्रथम दिवस होता है. इसे विस्तार से कहें तो “नए साल के पहले दिन विजय ध्वज स्थापित करना” ऐसा अर्थ होता है.
Q : गुड़ी पड़वा का दूसरा नाम क्या है?
A : महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा नाम से प्रसिद्ध यह दिन अन्य स्थानों पर उगादी, युगादि या नव संवत्सर नाम से जाना जाता है.
Q : क्या शिवाजी महाराज ने गुड़ी पड़वा मनाया था?
A : ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार छत्रपति शिवाजी महाराज की विजय के प्रतीक के रूप में भी “गुड़ी खड़ी” करने की परंपरा प्रचलित हुई थी.
Q : गुड़ी पड़वा पर क्या परिधान पहनें?
A : इस दिन पारंपरिक कपड़े पहनने का प्रचलन हैं. महिलाएं नौवारी साड़ी पहनती हैं और पुरुष कुर्ता-पायजामा या पारंपरिक मराठी पोशाक पहने दीखते हैं.
Q : महाराष्ट्र का सबसे बड़ा पर्व कौन सा होता है?
A : महाराष्ट्र में गणपति पूजा का बड़ा महत्त्व है लेकिन
गुड़ी पड़वा को प्रमुख और महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है, क्योंकि यह मराठी नववर्ष की शुरुआत का प्रथम दिन है.
Q : गुड़ी पड़वा त्यौहार पर कौन सी मिठाई बनाई जाती है?
A : इस दिवस पर श्रीखंड,लड्डू, पूरन पोली और अन्य मीठी चीजें बनाई जाती है.
Q : गुड़ी पड़वा पर्व के दिन क्या खाना चाहिए?
A : गुड़ी पड़वा पर नीम की पत्तियां, गुड़, इमली और आम का मिश्रण खाने की पुरानी परंपरा है, यह रीती जीवन के अलग-अलग स्वादों का प्रतीक बताई जाती है.
Q : गुड़ी पड़वा फेस्टिवल पर घरों के बाहर क्या लगाया जाता है?
A : इस दिन घर के बाहर एक लंबा डंडा लगाकर उस पर रेशमी कपड़ा, नीम के पत्ते, आम की पत्तियां और कलश लगाकर गुड़ी स्थापित की जाती है.
Q : गुड़ी पड़वा के लिए प्रसाद क्या क्या होता है?
A : इस शुभ दिवस पर इमली, धनिया, नीम पत्ती और गुड़ का मिश्रण कर के प्रसाद दिया जाता है.
Q : गुड़ी पड़वा के दिन हम किस की पूजा करते हैं?
A : गुड़ी पड़वा के दिन हम भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करते हैं.
Q – गुड़ी पड़वा मुख्यतः कौनसे राज्य में मनाया जाता है? अन्य राज्यों में इस समय क्या पर्व होते हैं?
A – गुड़ी पड़वा महाराष्टा और गोवा का प्रमुख त्यौहार है, इसके अलावा आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में इस समय युगाडी त्यौहार होता है और तमिलनाडु में उस समय पुथंडु फेस्टिवल मनाते हैं.
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