Panchatantra Stories in Hindi / Panchtantra Ki Kahaniyan
मित्रों, हममें से अधिकांश ने बचपन में ‘बाल-बुद्धि’ को सहज ही कुशाग्र बनाने वाली “पंचतन्त्र” की प्रेरक एवं मनोरंजक कहानियां अवश्य पढ़ी होंगी क्योंकि हिन्दी भाषा में लिखीं गईं इन कहानियों का हमारे देश की लगभग सभी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।इतना ही नहीं अंग्रेज़ी भाषा में अनुवादित होने के कारण ये कहानियाँ विश्व-विख्यात भी हैं।
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पंचतंत्र की कहानियों का इतिहास ( History of Panchtantra Ki Kahaniyan)

पंचतंत्र की कहानियां
पञ्चतंत्र की ये कहानियाँ कब और क्यों लिखीं गईं ,इसके पीछे एक अत्यंत रोचक इतिहास है। कहते हैं कि प्राचीन काल में पाटलीपुत्र में ; जो आज पटना के नाम से विख्यात है, एक सुदर्शन नाम का अत्यंत गुणी राजा राज्य करता था।एक दिन उस राजा ने किसी कवि के द्वारा पढ़े जाते हुए दो श्लोक सुने जिनका भाव कुछ इस प्रकार था:
1) शास्त्र अर्थात् ज्ञान ही मानव के वास्तविक नेत्र होते हैं क्योंकि ज्ञान के द्वारा ही हमारे समस्त संशयों एवं भ्रमों का छेदन किया जा सकता है ;सत्य एवं तथ्य का परिचय भी ज्ञान के ही माध्यम से सम्भव हुआ करता है तथा अपनी क्रियायों के भावी परिणाम का अनुमान भी हम केवल अपने ज्ञान के द्वारा ही लगा सकते हैं
2) यौवन का झूठा घमण्ड ,धन-सम्पत्ति का अहंकार ,प्रभुत्त्व अर्थात् सब को अपने आधीन रखने की महत्त्वाकांक्षा तथा अविवेकिता यानि कि सही और गलत के बीच अंतर को न पहचानना—इन चारों में से एक का भी यदि हम शिकार बन गये तो जीवन व्यर्थ होने की पूरी-पूरी सम्भावना होती है; और फिर जहाँ ये चारों ही एक साथ हों तो फिर तो कहना ही क्या !
राजा ने जैसे ही ये श्लोक सुने , तो उसे अपने नित्य कुमार्ग पर चलने वाले और कभी भी शास्त्रों को न पढ़ने वाले पुत्रों का ध्यान हो आया। अब तो वह अत्यधिक विचलित हो कर सोचने लगा—
विद्वान कहते है कि इस संसार में उसी का जन्म लेना सफल होता है जो अपने सुकर्मों के द्वारा अपने वंश को उन्नति के मार्ग पर ले जाता है अन्यथा तो इस परिवर्तनशील संसार में लोग बार–बार जन्म लेकर मृत्यु का शिकार बनते ही रहते हैं।दूसरे; सौ मूर्ख पुत्रों से एक गुणी पुत्र श्रेष्ठ होता है क्योंकि वह अपने कुल का उद्धारक बनता है ; ठीक वैसे ही कि जैसे एक अकेला चन्द्रमा रात्रि के अन्धकार को दूर करता है जबकि यह काम आकाश में स्थित अनगिनत तारे भी नहीं कर पाते।
अब राजा सुदर्शन केवल इसी चिंता में घुलने लगा कि कैसे वह अपने पुत्रों को गुणवान् बनाये? क्योंकि –
वे माता-पिता जो अपने बच्चों को शिक्षा के सुअवसर उपलब्ध नहीं करवाते ,वे अपने ही बच्चों के शत्रु हुआ करते हैं क्योंकि बड़े होने पर ऐसे बच्चों को समाज में कोई भी प्रतिष्ठा नहीं मिलती जैसे हंसों की सभा में बगुलों को सम्मान कहाँ ? दूसरे, चाहे कोई व्यक्ति कितना भी रूपवान् क्यों न हो ,उसका कुल कितना भी ऊँचा क्यों न हो यदि वह ज्ञानशून्य है तो समाज में आदर का पात्र नहीं बन सकता जैसे कि बिना सुगंधी वाले टेसू के पुष्प देवालय की प्रतिमा का श्रृंगार नहीं बन सकते।
चिंतित एवं दुःखी मन होने के बावजूद भी राजा ने एक दृढ निश्चय कर ही लिया कि अब भाग्य के सहारे बैठना ठीक न होगा ,बस केवल पुरुषार्थ ही करना होगा।उसने बिना समय गंवाए पंडितों की एक सभा बुलवाई और उस सभा में आये पंडितों को अत्यंत सम्मानपूर्वक सम्बोधित करते हुए कहा—“क्या आप में से कोई ऐसा धैर्यशाली विद्वान है जो मेरे कुमार्गगामी एवं शास्त्र से विमुख पुत्रों को नीतिशास्त्र के द्वारा सन्मार्ग पर ला कर, उनका जन्म सफल बना सके ?”
मित्रों, विद्वानों की उस सभा में से विष्णु शर्मा नाम का एक महापंडित जो समस्त नीतिशास्त्र का तत्वज्ञ था, गुरु बृहस्पति की भांति उठ खड़ा हुआ और कहने लगा–“ राजन् !आपके ये राजपुत्र आपके महान् कुल में जन्मे हैं।मैं मात्र छह महीनों में इन्हें नीतिशास्त्र पढ़ा कर, इनका जीवन बदल सकता हूँ।” यह सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ राजा बोला –“एक कीड़ा भी जब पुष्पों के साथ सज्जनों के मस्तक की शोभा बन सकता है और महान् व्यक्तियों के द्वारा प्रतिष्ठित एक पत्थर भी ईश्वर की प्रतिमा का स्वरूप ले सकता है, तो निःसंदेह आप भी यह कठिन कार्य अवश्य कर सकते हैं।”
अब राजा सुदर्शन ने बड़े सम्मान के साथ अपने पुत्रों को शिक्षा-प्राप्ति के लिए पंडित विष्णु शर्मा को सौंप दिया और उस विद्वान ने भी राजा के उन शास्त्रविमुख पुत्रों को मात्र छह महीनों में ; पशु-पक्षियों एवं जीव-जन्तुओं की मनोरंजक तथा प्रेरणादायक कहानियों के माध्यम से नीतिशास्त्र का ज्ञान करवाया जिससे उनका जीवन ही बदल गया। मित्रों, यही कहानियाँ ‘पंचतन्त्र की कहानियां’ कहलाती हैं जो हितोपदेश नामक ग्रन्थ का आधार हैं।
आइये, पंचतंत्र की दो प्रसिद्ध कहानियां पढ़ें और अपने बचपन को और साथ-साथ इनसे मिलने वाली ‘प्रेरणा’ एवं ‘सीख’ को भी पुनः स्मरण कर लें।
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कछुआ और खरगोश
एक बार की बात है कि एक जंगल में एक कछुए और एक खरगोश में रेस हो गयी। अभी दौड़ते-दौड़ते थोड़ा ही समय गुज़रा था कि खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा कि कछुआ काफी पीछे रह गया है। उसने सोचा कि कछुए की चाल तो बहुत ही धीमी है इसलिए मैं थोड़ी देर विश्राम कर लेता हूँ।अब वह एक पेड़ की ठंडी छाँव में ऐसा सोया कि कछुआ, धीमी चाल होने के बावजूद भी, उससे आगे निकल कर अपने गन्तव्य तक पहुँच कर रेस जीत गया।मित्रों, इस कहानी के आधार पर ही यह कहावत मशहूर हो गयी जिसे लोग अक्सर दोहराया करते हैं कि—
“SLOW AND STEADY WINS THE RACE.”
इस कहानी का नया वर्जन ज़रूर पढ़ें : कछुआ और खरगोश – वो कहानी जो आपने नहीं सुनी!
Panchatantra stories in Hindi with moral
बन्दर और मगरमच्छ
एक नदी के किनारे एक जामुन के पेड़ पर एक बन्दर रहता था जिसकी मित्रता उस नदी में रहने वाले मगरमच्छ के साथ हो गयी।वह बन्दर उस मगरमच्छ को भी खाने के लिए जामुन देता रहता था।एकदिन उस मगरमच्छ ने कुछ जामुन अपनी पत्नी को भी खिलाये। स्वादिष्ट जामुन खाने के बाद उसने यह सोचकर कि रोज़ाना ऐसे मीठे फल खाने वाले का दिल भी खूब मीठा होगा ;अपने पति से उस बन्दर का दिल लाने की ज़िद्द की।
पत्नी के हाथों मजबूर हुए मगरमच्छ ने भी एक चाल चली और बन्दर से कहा कि उसकी भाभी उसे मिलना चाहती है इसलिए वह उसकी पीठ पर बैठ जाये ताकि सुरक्षित उसके घर पहुँच जाए।बन्दर भी अपने मित्र की बात का भरोसा कर, पेड़ से नदी में कूदा और उसकी पीठ पर सवार हो गया।जब वे नदी के बीचों-बीच पहुंचे ; मगरमच्छ ने सोचा कि अब बन्दर को सही बात बताने में कोई हानि नहीं और उसने भेद खोल दिया कि उसकी पत्नी उसका दिल खाना चाहती है।बन्दर को धक्का तो लगा लेकिन उसने अपना धैर्य नहीं खोया और तपाक से बोला –‘
ओह, तुमने, यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई क्योंकि मैंने तो अपना दिल जामुन के पेड़ की खोखल में सम्भाल कर रखा है।अब जल्दी से मुझे वापस नदी के किनारे ले चलो ताकि मैं अपना दिल लाकर अपनी भाभी को उपहार में देकर; उसे खुश कर सकूं।
मूर्ख मगरमच्छ बन्दर को जैसे ही नदी-किनारे ले कर आया ;बन्दर ने ज़ोर से जामुन के पेड़ पर छलांग लगाई और क्रोध में भरकर बोला –“अरे मूर्ख ,दिल के बिना भी क्या कोई ज़िन्दा रह सकता है ? जा, आज से तेरी-मेरी दोस्ती समाप्त।”
मित्रो ,बचपन में पढ़ी यह कहानी आज भी मुसीबत के क्षणों में धैर्य रखने की प्रेरणा देती है ताकि हम कठिन समय का डट कर मुकाबला कर सकें। दूसरे, मित्रता का सदैव सम्मान करें।
रजनी सडाना
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We are grateful to Mrs. Rajni Sadana for reminding us of our sweet childhood tales and the great MORALS of PANCHTANTRA STORIES IN HINDI ( Panchtantra Ki Kahaniyan)
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Nice Story
I love these stories very much
I luv to read these stories more and more
For my children
Very glad to read these stories.. With lots of moralities
Very nice stories. These stories give us knowledge.
i love these stories because they remembered our childhood and refresh mind.
thank you
regards – saurabh yadav
Very nice stories because these are started recalling our childhood memories
Great stories
NICE AND MORAL TAKING STORIES
Nice stories
Because these stories refresh our memories of childhood.