संत दामाजी पंत की जिवनी व् कथा | Damaji Pant Biography Hindi

परोपकार करुणा और भक्ति के हिमायती संत दामाजी पंत 15वीं शताब्दी में जन्मे थे. उनका जन्मस्थान मंगलवेढ़ा (महाराष्ट्रा) बताया जाता है. वे मराठी ब्राह्मण थे. उनके परिवार में भक्तिभाव वाला माहौल रहता था, इस लिए उनके मन में पूजा-पाठ, सेवाभाव और परोपकार के गुण बाल्यकाल से ही बसे हुए थे. दामाजी के गृहस्थ जीवन के बारे में अधिक जानकारी तो उपलब्ध नहीं, लेकिन कहते हैं कि उनकी भारिया सदैव धार्मिक और सेवाकिय कार्यों में दामाजी का साथ देती थीं. Bhakit Damaji एक गृहस्थ संत भी कहे जाते थे.
दामाजी पंत राज्य के अधिकारी के तौरपर
उनके पद की बात करें, तो समझ लीजिए जैसे आज कोई कोषाध्यक्ष हो, या जिले का कलेक्टर हो, उनका पद रजवाड़े में ऐसा ही रहा था. वे गोगलकुंडा बिदरशाही के आधीन मंगलवेढ़ा” प्रांत का “शासनबार” संभालते थे.
गरीबों की सेवा और धर्मयुक्त निर्णय लेना उनके सिद्धांतों में शामिल था. वे करुणा और दया को ध्यान में रख कर अपने फैसले लेते थे, इसी कारण उनकी लोकप्रियता भी बहुत रही. यहाँ तक की समाज-कल्याण के कार्यों में वे अपनी आय-पगार खर्च कर देने में भी हिचकते नहीं थे. उनकी ईमानदारी के चर्चे दूर दूर तक होते थे. यहाँ तक की खुद बादशाह भी दामाजी की इस उदारवादी वॄति से अवगत था.
मंगलवेढ़ा से जुड़ा Fact
मंगलवेढ़ा को संतभूमि भी कहा जाता है। यहाँ संत चोखामेळा, संत कान्होपात्रा और संत दामाजी पंत जैसे संतों का संबंध रहा है। इसके अलावा, द्वैत संप्रदाय के आचार्य जगततीर्थ का जन्म भी यहीं हुआ था।
संत दामाजी पंत की प्रसिद्ध कथा (Damaji Bhakt Story)

एक समय की बात है, कोई गरीब ब्राह्मण दामाजी पंत के द्वार पर आया. अतिथि सत्कार करते हुए दामाजी ने ब्राह्मण को भीतर आ कर भोजन ग्रहण करने का न्यौता दिया.
कुछ संकोच के उपरांत वह ब्राह्मण भोजन करने आ गया, फिर पंगत बैठी, तो वो भी खाना खाने लगा, लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ की सब लोग चौंक गए, वो ब्राह्मण सिसक सिसक कर रोने लगा.
तभी करुणा मूर्ती “दामाजी” आगे आते हैं, और गरीब ब्राह्मण के इस रहस्यमयी संताप का कारण पूछते हैं, तब वो अपनी व्यथा सुनाते हुए कहता है कि…
पंढरपुर में मेरा परिवार है, उनके पास खाने को अनाज का एक दाना नहीं बचा है. तब दामाजी उसको आश्वाशन देते हुए कहते हैं कि तुम अपने मन को व्यग्र ना करो, तुम्हारे परिवार को मदद भेजने की व्यवस्था मैं अवश्य करूंगा.
भोजन के उपरांत भक्त दामाजी ने उसे ढेर सारे चावल की एक गठरी बांध कर देदी. तब वो दुखियारा मंगलवेढ़ा से पंढरपुर की और चल पड़ा.
प्रांत में हर जगह अकाल का माहौल था, तो सफर के दौरान कुछ आक्रामक लोगों ने निर्धन ब्राह्मण पर प्रहार कर दिया, और उसके सारे चावल छीन लिए. इस घटना से वो ब्राह्मण बेहद दुःखी हुआ.
इस घटना के बाद, यह बात आग की तरह फैली, तो बहुत से लोग पंत के द्वार जा पहुँचते हैं, उन्हें कहते हैं कि, वे सब भूखे मर रहे हैं, उनके लिए भी दाना-अनाज की व्यवस्था की जाए.
अब दामाजी पंत के पास अनाज भंडार तो अवश्य था, लेकिन उसे लोगों में बांटने का अधिकार नहीं था, क्यों की वह सारा धान बिदर के बादशाह की जागीर था.
दामाजी उस समय दुविधा में थे, उन्होंने अपनी पत्नी से इस विषय पर चर्चा की, फिर यह निर्णय लिया की लोगों के प्राण बचाने के लिए धान-भंडार के द्वार खोल दिए जाए.

इस परोपकारी निर्णय से सैकड़ों हजारों लोगों के पेट में भोजन पड़ा और उनकी अंतरात्मा तृप्त हुई. धीरे धीरे यह बात आग की तरह चहुओर फ़ैल गई.
अब देरसवेर यह बात, बादशाह तक भी पहुंचनी ही थी. उसी बादशाह के लिए एक “कन्नड़ व्यक्ति” काम करता था, जिसे दामाजी पंत से बड़ी चिढ़ व इर्षा रहती थी, उसने मौका देख् कर मुखबिरी कर दी.
बिदर का बादशाह जैसे ही यह बात सुनता है, उसका क्रॉध सांतवे आसमान पर जा पहुँचता है. उसी वक्त गुस्से में लाल-घूम सम्राट ने, अपने घुड़सवार दौड़ा दिए, आदेश था कि फ़ौरन दामाजी पंत को बंदी बना कर दरबार में पेश किया जाए, ताकि उसके अपराध की कड़ी सजा दी जा सके.
नगर में सैनिकों के घोड़ों के खुर की आवाज़ बझने लगी, उसी वक्त कोलाहल सुन कर दामाजी समझ गए की सम्राट का फरमान आया है, वे मानसिक रूप से तो इस कार्रवाई के लिए पहले से ही तैयार थे.
दामाजी ने तब सैनिकों से कहा, बिदर में राजा के दरबार में पेश होने से पहले मैं पंढरपुर जाना चाहता हूँ. सैनिकों ने पहले तो यह विनती ठुकरा दी, लेकिन जब दामाजी की पत्नी ने अपने सोने के कंगन उन्हें देने की बात कही, तो वे सब मान गए.
बिदर की यात्रा आरंभ हुई, मार्ग में पंढरपुर आया, जहाँ दामाजी ने “चंद्रभागा नदी” में स्नान किया. उसके बाद वे अपने आराध्य श्री विठ्ठल देव के मंदिर दर्शन करने जाते हैं.
उस मंदिर में हाथ जोड़ कर वे बोले, विठल्ला, अब शायद आपको अंतिम बार देख् रहा हूँ, इस जीवन में अगर मुझसे कोई अपराध हुआ है, तो क्षमा चाहता हूँ, अगर बादशाह मुझे मृत्युदंड दे दे, तो मेरे बाद, मेरे निःसहाय परिवार की रक्षा करना.

तभी सैनिक उन्हें वहां से चलने को कह देते हैं, क्यूँ की सम्राट को अगर यह भनक भी लग गई की कंगन के बदले पंढरपुर के रास्ते आए हैं तो उनकी खैर नहीं होनी.
भक्त का दुःख भगवान् सह नहीं पाए, उन्होंने उसी क्षण एक महार युवक का रूप धारण किया और मन की गति से बिदर के बादशाह के दरबार में जा पहुंचे.
उन्होंने सम्राट से कहा, मैं मंगलवेढ़ा से आया हूँ. मैं दामाजी पंत का सेवक हूँ, मेरा नाम “विट्ठु” है, दामाजी के अन्न से ही मैं पला-बढ़ा हूँ.
तब बादशाह अपनी भौएं चढ़ा कर पूछते हैं, की बात तेरा यहाँ आने का कारण क्या है? तब वह महार कहता है, आपकी प्रजा मंगलवेढ़ा में भूख-प्यास से तड़प रही थी, मेरे स्वामी ने इस करुण अवस्था को देखते हुए, लोक-कल्याण के लिये आपके धान्य भंडार के दरवाजे खोले. मैं आपको उसी का भुगतान देने आया हूँ.
क्रोधित बादशाह एक पल को चुप हो गया, जैसे मन ही मन उसे अपने आप पर लज्जा आ रही हो. लेकिन फिर भी वह कहता है आप मेरे खजांची के पास जाइये और मूल्य चूका दीजिये.
बड़े आस्चर्य की बात यह थी, की उस युवक “विट्ठु” की छोटी सी थैली में जो सोने की मोहरें भरी थी, उन्हें उलटने पर उतनी ही अधिक मोहरें पुनः उसमें आ जाती थीं. इस तरह उन्होंने खजांची से रसीद ले कर सारा मूल्य अदा कर दिया.

फिर बादशाह के हस्ताक्षर वाली दस्तावेज चिट्ठी लिये वो युवक मंगलवेढ़ा चल देता है. फिर दामाजी के घर पर वह जा कर भुगतान की पर्ची दे देता है और चला जाता है.
अब दामाजी को सैनिक बादशाह के सामने पेश करते हैं, क्यूँ की वो इन सब बातों से अवगत थे ही नहीं. भक्त दामाजी को सामने देख् कर बादशाह भावविभोर हो जाता है, वह दौड़ कर उन्हें गले लगा लेता है.
बादशाह उसके बाद “विट्ठु महार” की पूरी घटना का वृतांत देते हैं की कैसे उन्होंने मूल्य चुकाया,
अब दामाजी को बात समझ आ गई, की उनकी रक्षा को स्वयं विठल देव ही पधारे थे, क्यूँ की एकांत में भक्ति के समय वे ही विठल देव को, विट्ठु और विठल्ला कह कर पुकारते थे.
अंत में दामाजी भक्त बादशाह को अपना त्यागपत्र देते हैं, और अपना सब कुछ गरीबों में दान कर के, परिवार समेत पंढरपुर निकल जाते है, ताकि बचा हुआ जीवन अपने आराध्य विठल भगवान् की सेवा में गुज़ार सकें.
बाद में, वे आजीवन पंढरपुर में रहे और वहिं अपने प्राण त्यागे, आज भी मंगलवेढ़ा में उनका एक मंदिर स्थापित है.
मंगलवेढ़ा वर्तमान समय में सोलापुर (महाराष्ट्रा) से 55 KM की दुरी पर है और पंढरपुर से केवल 25 KM की दुरी पर स्थित है.

दामाजी पंत की जीवनी से सीख (Life Lesson)
आस्था : विज्ञान में विश्वास रखो लेकिन धार्मिक आस्था भी है जरुरी, इसे भले ही प्रमाणित न किया जा सके, लेकिन मन को पवित्र रखने और एक मानवी में दयाभाव के गुण विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण है. दामाजी लोक कल्याण के लिए प्रेरित हुए क्यूँ की उन्हें बचपन से यह माहौल और संस्कार मिले थे.
निडरता : जब बादशाह का अनाज नगर में बांट दिया, तभी दामाजी को पता था, सम्राट कठोर दंड देगा, परंतु उन्होंने लोगों के कष्ट को समझा और निर्भय बन कर एक फैसला लिया, खुद की परवाह नहीं की. वैसे तो नियम-कायदों का पालन करना चाहिए, लेकिन जब बात धर्म और लोक-कल्याण की हो तो व्यक्ति को न्याय का पक्षधर बन कर निर्णय लेना चाहिए, जैसे दामाजी ने लिया.
संगाथ : बहादुर एक मौत मारेगा, कायर रोज तिल तिल कर मरेगा. दामाजी लोगों के दुःख दूर करने के निर्णय पर अटल थे, उनका परिवार चाहता तो घर पे कलह कर के उन्हें रोकने का प्रयास करता, क्यूँ की कोई नहीं चाहता की राज्य का बादशाह शत्रु बन जाए, लेकिन दामाजी की पत्नी और स्वजनों ने ऐसी कायरता-पूर्ण बात नहीं सोची, उन्होंने दामाजी के धान-भंडार के द्वार खोल देने के निर्णय का समर्थन किया, तो जब हमारे आसपास कोई व्यक्ति धर्मयुक्त निर्णय ले रहा हो तब, हमें उसके साथी बनना चाहिए, जैसे दामाजी का परिवार उनके साथ रहा.
कर्मा : दामाजी ने निस्वार्थ भाव से कर्म किया, और स्वयं विठल भगवान भुगतान करने धरती पर उतर आए, यह किस्सा भले ही आपको “दन्तकथा” जैसा लगे, लेकिन हो सकता है, ईश्वर की जगह कोई धनवान उदार व्यक्ति ही, आपकी मदद को आ जाए, दुनियां में ऐसे अच्छे लोग भी होते हैं जो, मुसीबत में फंसे इन्सान को डूबने नहीं देते. तो आप आस्तिक हों या नास्तिक “अच्छे कर्मों का महत्त्व” समझे. वे देर से ही सही लेकिन “फल” देते हैं.
QNA (Bhakt Damaji Story Hindi)
Q – दामाजी पंत किस शताब्दी में थे?
A – वे 15वीं शताब्दी में हुए थे.
Q – Bhakt Damaji का परिचय क्या है?
A – तथ्य अनुसार, वे महाराष्ट्र के एक महान वारकरी संत और भगवान विट्ठल के परम भक्त हुआ करते थे.
Q – घर चलाने के लिए दामाजी पंत क्या काम करते थे?
A – पेशे से वह किसी बहमनी राजा के अधीन, मंगलवेढ़ा के मुख्य राजस्व अधिकारी अर्थात कामाविसदार थे.
Q – संत दामाजी पंत का एक पराक्रम बताएं?
A – 15वीं शताब्दी में एक बार भीषण अकाल हुआ तो उन्होंने राजा को पूछे बिना ही “अनाज भंडार” गरीबों के लिए खोल दिए थे.
Q – दामाजी पंत और किस नाम से प्रसिद्ध हुए थे?
A – परोपकार की भावना और ईश्वर में आस्था के गुण होने के कारण वे “भक्त दामाजी” भी कहे जाते थे.
Q – Bhakt Damaji की आस्था कौनसे भगवान में थी?
A – वे भगवान विट्ठल की पूजा करते थे और फुरसद के समय भक्ति-गीत गा कर समय बिताते थे.
Q – दामाजी पंत की जाती क्या थी?
A – वे मराठी ब्राह्मण (हिन्दू) परिवार में जन्मे थे. (हिन्दू धर्म के वारकरी).
Q – देवता विठोबा कौन थे?
A – उन्हें “वारकरी संप्रदाय के संरक्षक देवता” का दर्जा प्राप्त था, इसी लिऐ Bhakt Damaji को उन पर गहरी आस्था थी.
Q – प्रभु विठोबा का कोई परचा या चमत्कार बताएं?
A – कहा जाता है कि विठोबा एक बार अछूत व्यक्ति का रूप ले कर, “सोने की थैली” लिए, अनाज का भुगतान करने राजा के दरबार में गए थे, और दामाजी की रक्षा की.
Q – वर्ष 1460 में दक्कन में हुए, उस भयंकर अकाल को कैसे याद किया जाता है?
A – संत दामाजी की उदारता को ध्यान में लेते हुए, उस समय को, दामाजी पंत के अकाल के रूप में याद रखा गया है.
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