बर्बरीक से खाटू श्याम बनने की रहस्यमयी कहानी | Khatu Shyam Story In Hindi

जब गुरु द्रोण ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा में अंगूठा माँगा तब एकलव्य ने हँसते-हँसते उसे गुरु को समर्पित कर दिया….इसमें कोई शक नहीं कि एकलव्य महान था…लेकिन क्या कोई ऐसा शिष्य भी हो सकता है जिसने गुरु आज्ञा का पालन करते हुए अपना शीश ही दान कर दिया हो? (Khatu Shyam Story In Hindi)
जी हां, है….बिलकुल है…और आज मैं आपको उसी अद्वितीय शिष्य की गौरव गाथा सुनाने जा रहा हूँ जिसके त्याग, साहस और पराक्रम की कथा सुन कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे! ये कथा है भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की, जिन्हें आज पूरी दुनिया खाटू श्याम जी के रूप में पूजती है.
नमस्कार, मैं हूँ अजय अजमेरा, स्वागत करता हूँ आपका, आपके अपने ब्लॉग achhikhabar(dot)com पर. मेरा जन्म सीकर में हुआ. सीकर शहर से लगभग 43 किलोमीटर दूर खाटू नामक स्थान है, वहीं भगवान खाटू श्याम का भव्य मंदिर है. इस मंदिर की महिमा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में है….क्योंकि जब इंसान हर उपाय करके हार जाता है और उसे इस दुनिया में कोई भी सहारा देने वाला नहीं मिलता…तब कलियुग के कृष्ण, भगवान खाटू श्याम ही उसका सहारा बनते हैं — तभी तो उनके करोड़ों भक्त बड़े श्रद्धा भाव के साथ उन्हें गुलाब का फूल अर्पित कर जोर से जयकारा लगाते हैं.
“हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा”
दोस्तों, ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे कई बार भगवान् खाटू श्याम के दर्शन करने और उनकी महिमा का गुणगान सुनने का अवसर मिला है. कई महीनों से मैं भगवान् खाटू श्याम पर एक पोस्ट बनाने की सोच रहा था… पर किसी न किसी कारण से बना नहीं पा रहा था… लेकिन पिछले हफ्ते जब मुझे बाबा का ध्यान आया ही था कि तभी मेरे सामने से एक गाड़ी गुजरी जिसपर पीछे लिखा हुआ था- “हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा”
मुझे लगा अब और delay करना ठीक नहीं, इसीलिए आज मैं आपके सामने भगवान् खाटू श्याम का ये पोस्ट लेकर हाज़िर हूँ. अगर आप भी बाबा के भक्त हैं तो निवेदन करता हूँ कि इस पोस्ट को लाइक & शेयर करते हुए आगे बढें.
दोस्तों, इस कहानी की शुरुआत होती है आज से लगभग पांच हज़ार साल पहले के भारत में….वो भारत, जो साक्षी बनने वाला था अब तक के सबसे बड़े संग्राम – महाभारत का.
दोस्तों, महाभारत का युद्ध, केवल शक्ति और शस्त्रों का घमासान नहीं था, बल्कि यह धर्म – अधर्म, नीति – अनीति, और सत्य -असत्य का महायुद्ध था. और जब यह युद्ध आरंभ होने वाला था, उसी समय एक युवा योद्धा रणभूमि की ओर बढ़ा. नाम था — बर्बरीक, बर्बरीक असाधारण क्यों था, और उसका नाम बर्बरीक क्यों पड़ा ये आपको ज़रूर जानना चाहिए.
बर्बरीक भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र था
महाबली भीम और घटोत्कच का परिचय देने की आवश्यकता नहीं है, पर फिर भी इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि – द्वीतीय पांडव, गदायुद्ध के महारथी महाबली भीम अकेले दस हजार हाथियों के बराबर बल रखने वाले महान क्षत्रिय थे.
वहीं भीम और राक्षसी हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच शक्ति, भक्ति और बलिदान के प्रतीक माने जाते थे- अगर उन्होंने कर्ण को अपना दिव्य ब्रह्मास्त्र प्रयोग करने के लिए मजबूर नहीं किया होता तो अर्जुन कर्ण के हाथों मारे जाते…और तब महाभारत का परिणाम कुछ और ही होता.
दोस्तों, जिसका जब पिता इतना बड़ा बलिदानी हो, भला उसका पुत्र त्याग करने में पीछे कैसे रह सकता था….मैं आपको बर्बरीक के अकल्पनीय त्याग की गाथा ज़रूर सुनाऊंगा… लेकिन उससे पहले ये जानना ज़रूरी है कि –
बर्बरीक की माता कौन थीं ?
उनके बारे में बहुत कम बात होती है, लेकिन उस माँ में कुछ तो ख़ास होगा जो बर्बरीक जैसे शूरवीर, त्यागवीर और धर्मवीर ने उनकी कोख से जन्म लिया. दरअसल, बर्बरीक की माता का नाम था मौर्वी—महाबली असुर मुरा की अत्यंत पराक्रमी कन्या जो अनगिनत रहस्यमयी शक्तियों की स्वामिनी थीं. कहते हैं उनपर माँ कामाख्या की विशेष कृपा थी.
जब भगवान् कृष्ण ने प्राग्ज्योतिश नामक स्थान पर हुए युद्ध में मुरा राक्षस का वध किया, तब मौर्वी ने स्वयं वासुदेव को ललकार दिया….तभी माँ कामाख्या प्रकट हुईं और कृष्ण से बताया कि मौर्वी उनकी भक्त है और उन्हें प्रसन्न कर उसने कई सिद्धियाँ प्राप्त की हैं…..साथ ही उन्होंने मौर्वी को समझाया कि इस ब्रह्माण्ड में कोई भी कृष्ण को परास्त नहीं कर सकता, इसलिए तुम उनकी शरणागत हो जाओ.
बाद में कृष्ण की कृपा से घटोत्कच और मौर्वी का विवाह हुआ और उन्हें बर्बरीक के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. स्कन्द पुराण में बर्बरीक के जन्म की बड़ी ही रोचक और अद्भुत कथा बताई गई है. बर्बरीक ने जन्म लेने के कुछ ही क्षणों में युवा अवस्था प्राप्त कर ली थी. उनका रंग गहरा और शरीर वज्र जैसा बलिष्ट था. जन्म से ही बर्बरीक के सिर पर घने, लम्बे, उलझे हुए बाल थे, मानो कोई बर्बर, यानी, असभ्य-जंगली व्यक्ति हो…. इसलिए उनका नाम बर्बरीक पड़ गया.
बर्बरीक का शौर्य
बर्बरीक अपने माता-पिता की तरह ही चमत्कारी, बलशाली, पराक्रमी और महान त्यागी थे, साथ ही उनके अन्दर विनम्रता और न्याय का भाव भी था. एक बार पिता घटोत्कच आकाश मार्ग से उन्हें श्री कृष्ण की नगरी द्वारका ले गए. बर्बरीक बोले, “हे माधव! जन्म लेने के बाद कोई प्राणी अपना परम-कल्याण कैसे कर सकता है?”
कृष्ण बोले, “वत्स चूँकि तुम क्षत्रिय कुल में जन्मे हो, इसलिए अतुलनीय पराक्रम प्राप्त करना ही तुम्हारा परम कल्याण कर सकता है और यह पराक्रम तुम दैवीय कृपा से ही प्राप्त कर सकते हो. इसलिए जाओ महिसागर संगम के गुप्त क्षेत्र में कठोर तपस्या करो.” इसी समय कृष्ण को बर्बरीक के त्याग, विनम्रता और न्याय प्रियता का बोध हो चुका था, इसलिए उन्होंने बर्बरीक को एक और नाम भी दिया – सुहृदय, यानी सुन्दर दिल वाला.
इसके बाद बर्बीक मन ही मन श्री को अपना गुरु भी मानने लगे और उनसे विदा लेकर उन्होंने माँ दुर्गा की घोर तपस्या की. माँ प्रसन्न हुईं और उन्हें वरदान स्वरूप तीन अमोघ बाण प्रदान किए, जिनके बार में हम आगे और बात करेंगे. दोस्तों, यहाँ मैं ये भी कहना चाहूँगा कि कई विद्वानों का मानना है कि बर्बरीक ने वह बाण शिव शंकर भोलेनाथ की तपस्या कर प्राप्त किये थे. खैर, जो भी हो, बर्बरीक की तरकश में वो तीन बाण मौजूद थे, इसलिए उन्हें “तीन बाणधारी” भी कहा जाता है.
स्कन्दपुराण में एक और बड़ी ही रोचक कथा का वर्णन

अज्ञातवास के समय भीम एक सरोवर के निकट पहुँचे. बर्बरीक भी वहीं तपस्या में लीन थे. दोनों एक दुसरे को पहचान नहीं सके. भीम जैसे ही सरोवर में प्रवेश करने वाले थे, बर्बरीक ने उन्हें रोका, कहा, “मैं इस जल को ईश्वर को अर्पित करता हूँ, कृपया आप इसमें प्रवेश ना करें, यह एक ब्राह्मण की हत्या के समान पाप है!” लेकिन भीम कहाँ सुनने वाले थे, उन्होंने इस जल पर सभी प्राणियों का अधिकार बता कदम आगे बढ़ाये.
तब दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ. बर्बरीक भारी पड़ने लगे, उन्होंने अपनी भुजाओं से भीम को हवा में उठा लिया तभी भोलेनाथ और माँ पार्वती प्रकट हुए और बर्बरीक को बताया कि भीम उनके पितामह यानी दादा जी हैं. तब बर्बरीक को बहुत पछतावा हुआ और उन्होंने अपने प्राण त्यागने तक की बात सोच ली. तब भोलेनाथ ने उन्हें समझाया कि उनके जीवन पर श्री कृष्ण का अधिकार है….निकट भविष्य में वही तुम्हारा उद्धार करेंगे!
श्री कृष्ण नहीं चाहते थे की, बर्बरीक महाभारत युद्ध में भाग ले
काल चक्र आगे बढ़ा… कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरवों और पांडवों की सेना एक दुसरे का लहू बहाने के लिए आतुर हो गई. बर्बरीक एक क्षत्रीय शूरवीर थे, भला वे युद्ध के मैदान से दूर कैसे रह सकते थे. उन्होंने प्रण किया कि वे महाभारत के युद्ध में उसी पक्ष की ओर से युद्ध करेंगे, जो दुसरे की तुलना में कमजोर प्रतीत होगा.
कृष्ण बर्बरीक की शक्ति और न्याय प्रियता से भली-भाँती परिचित थे. व जानते थे कि बर्बरीक के तीन बाण कुछ ही क्षणों में महाभारत का युद्ध ख़त्म कर सकते थे, जिसे धर्म की हानि हो सकती थी…इसलिए उनका इस युद्ध से दूर रहना ही उचित था.
तब मुरलीधर ने एक लीला रची… एक दिन बर्बरीक हस्तिनापुर के एक वृक्ष के नीचे बैठकर माँ भगवती की आराधना कर रहे थे. आंखें बंद, मन शांत, लेकिन तेज इतना कि पूरे ब्रह्मांड की ऊर्जा उनके चारों ओर महसूस की जा सकती थी.
उसी समय वहां भगवान श्रीकृष्ण स्वयं प्रकट हुए, कहा… “वत्स बर्बरीक, माँ भगवती ने तुम्हें जो तीन अमोघ बाण दिए हैं, उनकी चर्चा तो स्वर्गलोक तक पहुंच चुकी है… ज़रा दिखाओ तो सही.”
बर्बरीक ने बड़े उत्साह के साथ अपनी तरकश से वो तीन दिव्य बाण निकाले और श्रीकृष्ण को दिखाए.
श्रीकृष्ण ने पूछा – “ये बाण काम कैसे करते हैं, बर्बरीक?”
बर्बरीक बोले… “प्रभु, पहला बाण अपने लक्ष्य को चिन्हित करता है, दूसरा बाण – उस चिन्हित लक्ष्य को पल भर में भेद देता है, और तीसरा?” कृष्ण ने उत्सुकता से पूछा.
बर्बरीक मुस्कुराकर बोले… उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती… क्योंकि पहले दो ही सब कुछ समाप्त कर देते हैं.” तब कृष्ण ने बाणों का प्रदर्शन करने को कहा – “मान लो यह पेड़ दुश्मन
की सेना है और इसके पत्ते सैनिक. अब तुम इन्हें समाप्त करके दिखाओ.” बर्बरीक ने सिर झुकाया, श्रीकृष्ण को प्रणाम किया…
बर्बरीक ने अपनी बाण विद्या का प्रदशन किया

पहले बाण को अपने शीश से लगा उसकी वंदना की और फिर पहला बाण चलाया – जिसने पल भर में हर पत्ते पर एक चिन्ह बना दिया. इसके बाद उन्होंने दूसरा बाण शीश से लगा
उसकी वंदना करने लगे. तभी कृष्ण ने पेड़ का एक पत्ता तोड़ कर अपने बाएँ पैरों के नीचे दबा लिया.
इधर बर्बरीक ने वह दूसरा बाण भी छोड़ दिया- वो बाण सारे चिन्हित पत्तों को एक साथ भेदता हुआ अंत में श्रीकृष्ण के पैर में जा लगा. बर्बरीक घबरा गए! “प्रभु!! ये क्या हो गया!
क्षमा कीजिए…” सुहृदय हाथ जोड़कर क्षमा
माँगने लगे. कृष्ण मुस्कराए, बोले – “बर्बरीक, मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था. दरअसल तुम्हारे बाण चलाने से पहले मैंने एक पत्ता अपने पैर के नीचे दबा दिया था. मैं देखना चाहता
था कि क्या तुम्हारे बाण से कोई बच भी सकता है या नहीं. पर हे वीर, धन्य है तुम्हारी शक्ति कि मेरे शरणागत पत्ते को भी तुमने भेद डाला.… तुम्हारे बाण ने मेरी लीला भी पहचान ली.”
दोस्तों, माना ये भी जाता है कि भविष्य में ठीक उसी स्थान पर बहेलिये का तीर लगने के कारण कृष्ण की मृत्यु हुई थी….क्योंकि किसी साधारण तीर में उन्हें भेदने की शक्ति नहीं
थी…. शायद यह उनकी एक और लीला ही थी जो उन्होंने बर्बरीक के बाण से अपने शरीर का वह भाग चिन्हित कर लिया था.
खैर बर्बरीक की कथा पर वापस आते हैं… अब कृष्ण समझ चुके थे कि बर्बरीक जिस ओर से भी युद्ध लड़ेगा वही पक्ष विजयी होगा.
उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा – “अब बताओ, तुम इस युद्ध में किसकी ओर से लड़ोगे?”
बर्बरीक बोले – “भगवान, मैं हमेशा कमजोर पक्ष का साथ दूँगा. यही मेरा संकल्प है.”
श्रीकृष्ण ने कुछ देर सोचा, फिर बोले – “बर्बरीक, तुम्हारा यही व्रत तुम्हें धर्मसंकट में डाल देगा. मान लो आज पांडव कमजोर हैं तो तुम उनकी ओर से युद्ध करने जा रहे हो… लेकिन
अगर कल को कौरव कमजोर पड़ गए तब तुम क्या करोगे?” “तब मैं अपने वचन के अनुसार – कौरवों की ओर से युद्ध लडूंगा,” बर्बरीक ने उत्तर दिया.
कृष्ण बोले, “यही तो मैं समझाना चाहता हूँ वत्स! इससे तो क्षण-क्षण में शक्ति का संतुलन बदल जाएगा… कभी पांडव कमजोर हो जायेंगे तो कभी कौरव, और तुम्हे अपने वचन के
अनुसार हर समय अपना पक्ष बदलना होगा…. ऐसे करते-करते अंत में सिर्फ एक योद्धा बचेगा — और वो तुम खुद होगे बर्बरीक.” बर्बरीक शांत हो गए!.
तब श्रीकृष्ण ने उन्हें मार्ग दिखाया – “अगर तुम इस युद्ध में भाग ही न लो, तो न तुम्हारा व्रत टूटेगा, न धर्म संकट आएगा.” लेकिन क्षत्रिय होने के नाते वे युद्ध भूमि से दूर नहीं रह
सकते थे, इसलिए उन्होंने विनम्रता के साथ यह विकल्प त्याग दिया.
धर्म की रक्षा के लिए श्री कृष्ण ने मांगी “गुरु दक्षिणा”

अन्तर्यामी कृष्ण बोले, वत्स जब तुम अपने पिता के साथ द्वारका आये थे, तब तुमने मन ही मन मुझे
अपना गुरु माना था. “क्या आज मुझे मेरी गुरुदक्षिणा दोगे ?”
बर्बरीक ने झुक कर कहा – “भगवान, आप मेरे मार्गदर्शक हैं… और गुरु की आज्ञा मेरे लिए सर्वोपरि है कहिए, क्या गुरुदक्षिणा दूँ?”
श्रीकृष्ण ने कहा – “समाज, राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए… मुझे तुम्हारा शीश चाहिए.” एक पल को सन्नाटा छा गया.
लेकिन बर्बरीक मुस्कराए… बोले – “भगवान, मेरी एक अंतिम इच्छा है – महाभारत का ये धर्मयुद्ध, मैं अपनी आंखों से देखना चाहता हूँ.”
श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया “तथास्तु.”
बर्बरीक ने अपना शीश अपने हाथों से उतारकर श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया. धन्य है वो महावीर, जिसने धर्म की रक्षा हेतु गुरु चरणों में अपना शीश तक अर्पण कर
दिया….कोटि कोटि नमन, कोटि कोटि प्रणाम…. जय बर्बरीक ….जय खाटू श्याम…
क्षमा कीजियेगा दोस्तों, जब भी यह प्रसंग आता है, मैं थोड़ा भावुक हो जाता हूँ. दोस्तों, लोग आज कल सोशल मीडिया पर कुछ भी शेयर करते हैं….मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि
महाबली बर्बरीक की ये कथा अधिक से अधिक लाइक और शेयर करें साथ ही अगर इस कथा ने आपको झकझोरा हो तो कमेन्ट में जय श्री खाटू श्याम जरूर लिखें.
चलिए, अब कथा को आगे बढाते हैं –
बर्बरीक बने खाटू श्याम “हारे का सहारा”
इस महा बलिदान के बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक का शीश युद्धभूमि के पास एक ऊँचे टीले पर स्थापित किया… ताकि वह साक्षी बन सके महाभारत के महायुद्ध का.
और आशीर्वाद दिया – “हे बर्बरीक कलियुग में तुम मेरे ही रूप में पूजे जाओगे. तुम्हारा नाम होगा – श्याम…. खाटू श्याम. जो तुझे पुकारेगा, मैं उसकी सुनूंगा….पूर्ण श्रद्धा भाव से जो
कोई भी तेरी भक्ति करेगा…उसकी सभी मनोकामना मैं स्वयं पूर्ण करूँगा.” इसके बाद काल चक्र आगे बढ़ता गया. द्वापर का अंत हुआ और कलियुग की शुरुआत हुई. महाभारत की
यह कथा इतिहास बन गई, परंतु बर्बरीक का शीश, धरती की गोद में एक नई लीला की प्रतीक्षा कर रहा था.
राजस्थान के सीकर ज़िले में स्थित खाटू गाँव में कुछ अनोखा घटा
एक दिन एक ग्वाले ने देखा कि उसकी गाय रोज़ एक विशेष स्थान पर जाकर अपने आप दूध गिरा देती है. वह आश्चर्यचकित हुआ, पर पहले कुछ दिन उसे संजोग समझता रहा.
लेकिन जब यह घटना लगातार दोहराई जाने लगी, तो उसकी जिज्ञासा बढ़ी और उसने यह बात गाँव वालों को बताई. गाँव के बुजुर्गों और पंडितों ने इसे कोई चमत्कारी संकेत माना.
खुदाई शुरू हुई… और कुछ ही गहराई पर एक तेज़ प्रकाश निकलने लगा. वहाँ से जो बाहर निकला — वह था एक दिव्य शीश के आकर का चमत्कारी पत्थर. उसके मुख पर स्थिर
मुस्कान थी, और उसकी आँखों में कुछ कहने का भाव.
इसके बाद राजा रूप सिंह चौहान को स्वप्न आया— “यह वही बर्बरीक का शीश है, जो श्रीकृष्ण को समर्पित था यहाँ उसकी स्थापना करो, मंदिर बनाओ, और देखो कलियुग के
चमत्कार.” स्वप्न के अगले ही दिन राजा रूप सिंह ने सभा बुलाई और अपना स्वप्न सबको बताया. उन्होंने निश्चय किया कि जहाँ यह शीश मिला है, वहीं एक भव्य मंदिर बनाया
जाएगा. मंदिर का निर्माण आरंभ हुआ — श्रमिकों के हाथों में भक्ति थी, पत्थरों में श्रद्धा थी और पूरे वातावरण में दिव्यता घुल चुकी थी. कुछ ही समय में मंदिर तैयार हुआ और उसी
स्थान पर वह शीश स्थापित किया गया. जिस दिन मंदिर में पूजा का पहला दिन हुआ, उसी दिन से चमत्कारों की श्रृंखला शुरू हो गई. राजा के जीवन में सुख-शांति लौटी, प्रजा में
समृद्धि फैली और धीरे-धीरे यह मंदिर एक छोटा सा तीर्थ नहीं, बल्कि कलियुग की सबसे बड़ी आस्था का केंद्र बन गया.
“दोस्तों, खाटू श्याम जी का मंदिर केवल एक धार्मिक स्थान नहीं है — यह उन लोगों की अंतिम उम्मीद है जो हार चुके होते हैं.
हर दिन हजारों लोग अपने आँसुओं और विश्वास के साथ यहाँ आते हैं — और बाबा उन्हें खाली नहीं लौटाते”
खाटू श्याम जी की महिमा
मैंने खुद इस दिव्य स्थान पर लाखों भक्तों को बाबा की शरण में आते हुए देखा है. किसी का व्यापार डूब चुका होता है, किसी की संतान नहीं होती, कोई मानसिक अवसाद से जूझ रहा
होता है, और कोई जीने की उम्मीद छोड़ चुका होता है. लेकिन जो भी बाबा को सच्चे दिल से पुकारता है, वे उसकी ज़रूर सुनते हैं. ऐसे हजारों अनुभव हैं जहां लोगों की ज़िंदगी रातोंरात
बदल गई. कई महिलाएं जिन्हें डॉक्टर्स ने माँ बनने की संभावना से इंकार कर दिया था, बाबा के दर्शन और श्याम कुंड के जल से स्नान के बाद गर्भवती हुईं.
व्यवसायी जिन्हें दिवालिया घोषित कर दिया गया था, बाबा की कृपा से फिर से खड़े हो गए. दोस्तों, यहाँ के फाल्गुन मेले का दृश्य ही अलग होता! लाखों की संख्या में भक्त खाटू
पहुँचते हैं. चारों ओर खाटू श्याम नाम का संकीर्तन होता है, रथयात्रा निकलती है, और भक्त श्याम कुंड में डुबकी लगाकर पाप और पीड़ा दोनों से छुटकारा पाते हैं.
दोस्तों, बर्बरीक महापराक्रमी थे, पर आज उनकी पूजा उनके पराक्रम के कारण नहीं बल्कि उनकी विनम्रता, गुरुभक्ति और त्याग के कारण की जाती है. अहंकार से दूर रहते हुए हमें
इन सद्गुणों को अपने अंदर ज़रूर समाहित करना चाहिए…यही खाटू श्याम जी के प्रति हमारी असली भक्ति होगी.
अंत में मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि जीवन में कैसे भी समस्या आ जाए….. राहें धुंधली दिखनी लगे, जब कोई सहारा ना मिले, जब अपने भी परायों जैसे लगने लगें… तो बस एक
बार, सच्चे हृदय से पुकारिए — “जय श्री खाटू श्याम!”
आपकी पुकार ज़रूर सुनी जायेगी! कलियुग में इससे बड़ा ब्रम्हास्त्र और कोई नहीं! इसलिए मत डरिए, मत रुकिए, बस श्रद्धा के फूल चढ़ाइए और विश्वास के स्वर में कहिए —
“हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा!”
जय श्री कृष्ण जय श्री श्याम!
जय हिन्द जय भारत
अजय अजमेरा
फाउंडर & सीईओ
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Jay Khatu Shyam Ki
Khatu Shyam Baba Ki Jay
श्री खाटू श्याम बाबा की महिमा है निराली,
वे बात सुनते हैं सबकी, चाहे हो छोटी या भारी।
श्याम नाम का निरंतर जप मिटाए हर ग़म,
जो भी आए शरण में उनके, पाए सुख अपार,
खाटू श्याम बाबा हैं इस जग के आधार।