भारत के मजदूर | Bharat ke Majdoor Unsung Heroes

सो जाते हैं फ़ुटपाथ पे अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते
मुनव्वर राना का ये शेर शायद आपने भी सुना हो!
ये शेर मजदूरों की ज़िन्दगी बखूबी बयां करता है…. एक तरफ तो वे इतनी मेहनत करते हैं कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद उन्हें अपने आगोश में ले लेती है तो दूसरी तरफ वे ऐसी मुफलिसी में जीते हैं कि अखबार को ही उन्हें अपना बिस्तर बनाना पड़ता है!
नमस्कार दोस्तों, मैं अजय अजमेरा स्वागत करता हूँ आपका अपने Blog Achhikhabar(dot)com में. आज हम बात करेंगे भारत के मजदूरों की, झाँकेंगे उनके जीवन में और जानेंगे ऐसे तीन कड़वे सच जिनका सामना हर रोज लाखों-करोड़ों मजदूर करते हैं.
लेकिन दोस्तों कुछ भी बताने से पहले मैं भारत के सभी मजदूर भाइयों – बहनों को हाथ जोड़ कर प्रणाम करता हूँ. देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान अमूल्य है! पर्सनली, मेरी कम्पनी अजमेरा फैशन की सक्सेस में भी उनका बहुत बड़ा रोल है.
मैं ख़ास तौर से UP – Bihar से सूरत आकर कपड़ा उद्योग को अपनी भुजाओं की ताकत से आगे बढ़ाने वाले मजदूर भाइयों-बहनों को प्रणाम करता हूँ. आपने जो कुछ भी किया है और कर रहे हैं उसके लिए सम्पूर्ण कपड़ा उद्योग आपका दिल से आभारी है.
इस विडियो को देख रहे तमाम कपड़ा व्यापारियों से मैं निवेदन करता हूँ कि हमारे मजदूर भाइयों-बहनों को धन्यवाद देने के लिए इस blog post को Share ज़रूर करें. मजदूर भाइयों के जीवन से जुड़े कड़वे सच को जानने से पहले ज़रूरी है कि पहले ये समझा जाए कि वास्तव में मजदूर कहते किसे हैं और और भारत में मजदूरों की संख्या कितनी है.
दोस्तों, Industrial Disputes Act, 1947, के Section 2(s) में “workman यानी, श्रमिक या मजदूर का जिक्र आता है. “कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो वेतन के बदले, किसी industry में शारीरिक, स्किल्ड , unskilled, टेक्निकल , operational, क्लेरिकल या सुपरवाइज़री रोल में काम करता है, वह मजदूर है.”
खैर! ये तो हो गई सरकार की परिभाषा, लेकिन अगर हम एक आम आदमी के नज़रिए से समझें तो मेहनत-मजदूरी करके या शारीरिक श्रम करने वाला व्यक्ति ही श्रमिक या मजदूर कहलाता है. मकान निर्माण में ईंटे उठाने वाला, पेंटिंग-प्लास्टर करने वाला या लकड़ी का काम करने वाला व्यक्ति मजदूर है. खेतों में काम करने वाला व्यक्ति खेतिहर मजदूर की श्रेणी में आता है.
कारखाने में वेल्डिंग करने वाला, मशीन चलाने वाला व्यक्ति industrial labour में काउंट होता है. सड़क पर डामर बिछाने वाला, ईंट-भट्ठे में काम करने वाला, बंदरगाहों, एयरपोर्ट्स या फैक्ट्रियों में सामान लोड-अनलोड करने वाला व्यक्ति, ये सभी मजदूर हैं. पानी की टंकियों, सेप्टिक टैंकों इत्यादि की सफाई करने वाला शख्स, रेल की पटरियां बिछाने वाला व्यक्ति…ये सभी मजदूर हैं.
दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि भारत में इस प्रकार के कुल कितने मजदूर हैं?
आंकड़े चौंका देने वाले हैं.
हमारे देश में मजदूरों की संख्या 40 करोड़ से ऊपर है.
- इनमे से 50% से अधिक मजदूर Agriculture से जुड़े हुए हैं.
- Construction की फील्ड में लगभग 5 करोड़ मजदूर काम करते है.
- घरेलू कामगारों की संख्या 4 करोड़ से अधिक है.
मैं अपनी इंडस्ट्री यानी टेक्सटाइल इंडस्ट्री की बात करूँ तो पूरे भारत में इस उद्योग में डेढ़ से दो करोड़ मजदूर काम करते हैं.
दोस्तों, आपने मनरेगा यानी Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act का नाम जरूर सुना होगा.
हर साल अकेले मनरेगा के अंतर्गत लगभग 15 करोड़ मजदूर रजिस्टर होते हैं.
दोस्तों, 40 करोड़ का आंकड़ा मामूली नहीं होता. जब आप अमेरिका की पूरी आबादी, यानी 34 करोड़ में, और 6 करोड़ लोग जोड़ते हैं तब जाकर वो भारत में मजदूरों की संख्या के बराबर होता है. शायद आप सोचें कि जब मजदूरों की संख्या इतनी अधिक है तो इनकी ताकत भी सबसे अधिक होनी चाहिए! ये जो चाहें वो मांगें सराकार से मनवा सकते हैं!
लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि इनमे से ज्यादातर मजदूर, organized नहीं unorganized sector का हिस्सा हैं….ये संख्या में तो अधिक हैं पर एकजुट नहीं हैं!
इन्हें आम बोल चाल की भाषा में दिहाड़ी मजदूर कहा जाता है… यानी एक ऐसा मजदूर जिसके पास कोई जॉब गारंटी नहीं होती, वो जिस दिन काम करता है बस उस दिन का पैसा पाता है, अगले दिन की कोई गारंटी नहीं…. इसे आप ‘एक दिन की नौकरी’ कह सकते हैं…. ये कुछ ऐसा जैसे कि हर रोज प्यास बुझाने के लिए एक नया कुआँ खोदना.
और ऊपर से इसे कुएं को खोदते समय उनके पास हेलमेट जैसे सिंपल सेफ्टी उपकरण भी नही होता, चोट लगने पर इलाज की सुविधा भी नहीं दी जाती, ना ही accidental death पर किसी तरह का मुआवजा गारंटीड होता है.
हर कुछ दिनों पर मजदूरों की मौत की खबरें सामने आती रहती हैं… कभी लिफ्ट गिरने से तो कभी सीवर सफाई के दौरान तो कभी खादान में काम करते हुए मजदूरों के ज़िन्दगी कि शमा कब बुझ जाए कहा नहीं जा सकता. एक मजदूर की ज़िन्दगी कितनी कठिन होती है इसका अंदाजा ऐश-ओ-आराम से रहने वाले लोगों के लिए लगाना मुश्किल है.
वो कहते भी हैं न –
होने दो चराग़ाँ महलों में, क्या हमको अगर दीवाली है
मज़दूर हैं हम, मज़दूर हैं हम, मज़दूर की दुनिया काली है
दोस्तों, तो चलिए अब मैं आपको बताता हूँ मजदूर भाइयों-बहनों कीज़िन्दगी के तीन कड़वे सच:
पहला सच: अदृश्य होने की पीड़ा
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस सड़क से आप सुबह अपने घर से ऑफिस जाते हैं, वह सड़क किसने साफ की?
आपकी सोसाइटी में बाग-बगीचे संवारने वाला माली कौन है?
वो हाथ किसके हैं जिसने आपकी साड़ी पर हैण्ड वर्क करके उसे इतना खूबसूरत बना दिया?
क्या आपने कभी उससे बात करने, उसका नाम जानने की कोशिश की जो रोज आपके घर से कचरा ले जाता है ?
ये वो लोग हैं जो सूरज से पहले उठते हैं और सूरज ढलने के बाद भी काम करते हैं. फिर भी हम उन्हें देखते तक नहीं. वो हमारे लिए अदृश्य हैं. जैसे वो इंसान ही न हों.

दोस्तों, क्या आप जानते हैं जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा क्या है ?
मदर टेरेसा, जिन्होंने हज़ारों कुष्ट रोगियों की सेवा की थी, वे कहा करती थीं कि जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा इस तरह के रोग नहीं है, बल्कि इन रोगों के कारण उन्हें जो उपेक्षा मिलती है, वही जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा है! और करोड़ों मजदूर हर रोज इस ‘उपेक्षा’ रूपी पीड़ा से गुजरते हैं! जिन मालिकों के लिए वे हर रोज बारह-बारह सोलह-सोलह घंटे काम करते हैं, वही लोग उन्हें ऐसे ट्रीट करते हैं मानो वो एग्जिस्ट ही ना करते हों…., वे अदृशय हों!
दूसरा सच: घर छोड़ने की पीड़ा
अपने गाँव-कसबे में काम ना मिलने के कारण करोड़ों मजदूरों को अपना घर छोड़ना पड़ता है. 1992 में मैं भी सीकर छोड़ कर सूरत आया था! अपने गाँव की मिटटी, अपने माँ-बाप को छोड़ कर अनजाने शहर में, अनजाने लोगों के बीच जाने पर दिल कितना भारी हो जाता है… ये वही समझ सकता है जिसने कभी अपना घर छोड़ा हो. और विडम्बना देखिये!
शहर आकर वही मजदूर ना जाने कितने लोगों के घर बनाता है, पर उस बेचारे के पास अपना कोई घर नहीं होता!
किसी शायर ने क्या खूब कहा है –
शहर में मज़दूर जैसा दर–ब–दर कोई नहीं
जिस ने सब के घर बनाए उस का घर कोई नहीं
और अब तीसरा और आखिरी कड़वा सच: मेहनत करने पर भी पैसे ना मिलने की पीड़ा
दोस्तों, एक आंकड़ा देखकर मैं हैरान रह गया. National-level पर जो minimum wage guideline के अनुसार एक मजदूर के लिए भारत में न्यूनतम वेतन 200 रुपये प्रति दिन से भी कम निर्धारित है.
200 रु! सोचिये!…आप घर से पड़ोस की किराने की दुकान पे जाते हैं तो भी पांच सौ रुपये कैसे खर्च हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता, और यहाँ करोड़ों मजदूरों को इतने कम वेतन पर काम करना पड़ता है… और उससे भी बड़े आश्चर्य की बात है कि भारत में एक तिहाई से ज्यादा मजदूर न्यूनतम मजदूरी से भी कम कमाते हैं और इसमें भी महिला मजदूरों को तो और भी कम वेतन मिलता है…
लाखों बाल मजदूरों की तो बात ही छोड़ दीजिये….illegally उन्हें काम पर रख कर कैसे उनका शोषण किया जाता है, सिर्फ रोटी के बदले कैसे घंटो-घंटो काम करवा कर उनका बचपन बर्बाद कर दिया जाता है, ये आप सोच भी नहीं सकते.
दिल्ली में दिहाड़ी और अन्य मजदूरों की आवाज उठाने वाले मजदूर संगठन All India Trade Union Congress (AITUC) की जनरल सेक्रेटरी अमरजीत कौर ने एक टीवी इंटरव्यू में बताया था कि सरकार के तमाम दावों के बाद भी मजदूरों को न्यनूतम मजदूरी से वंचित रखा जा रहा है. और अगर कुछ मजदूर सौभाग्य से अच्छा वेतन पा भी जाते हैं तो उनपर हमेशा काम छिनने की तलवार लटकी रहती है. कोरोना काल के एक कड़वा सच भी आपके सामने रखना चाहूँगा.
कोरोना के समय लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर अपने घरों को लौट गए थे, सूरत से भी हज़ारों मजदूर अपने घर लौटे थे,…पर लॉकडाउन के बाद भी वे काम पर वापस नहीं आये, जानते हैं क्यों?
क्योंकि वे जिंदा ही नहीं बचे….
2019 में 32,000
2020 में 37,000 और
2021 में 42,000 दिहाड़ी मजदूरों ने आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्या कर ली.
दोस्तों, , आप और हम भारत-बंद का आह्वान होने पर, कर्फ्यू लगने पर, या हड़ताल होने पर खुश होते हैं कि चलो छुट्टी मिल जायेगी, एन्जॉय करेंगे, परिवार के साथ टाइम बितायंगे…. लेकिन जब एक मजदूर को ये खबर मिलती है तो वह काँप उठता है… कि अगर आज कहीं कोई काम नहीं मिला तो घर का चूल्हा कैसे जलेगा….
मेरा परिवार खाना कैसे खायेगा! हो सकता है आप इन बातों से रिलेट नहीं कर पा रह हों, क्योंकि आपने कभी गरीबी देखी ही नहीं होगी…. आप सोच ही नहीं पायेंगे कि कोई दस रूपये के लिए भी मजबूर हो सकता है…. लेकिन यकीन कीजिए मेरा…ये सच है.
शायद आज मुझे देखकर भी कोई अंदाजा नहीं लगा सकता कि मैंने अपनी लाइफ में कैसे-कैसे दिन देखे होंगे… पर सचमुच मैं ऐसे कई अनुभवों से गुजरा हूँ जो आपको एक-एक रुपये की कीमत का एहसास करा देते हैं.
इसीलिए मैं अजमेरा फैशन को सिर्फ अपना बिजनेस नहीं मानता, बल्कि मैं इसे एक ऐसा साधन मानता हूँ जिसके जरिये मैं लोगों को कम पैसों में अपना खुद का बिजनेस शुरू करने का और गरीबी के चंगुल से हेमशा-हमेशा के लिए बाहर निकलने का रास्ता दिखा सकता हूँ.

दोस्तों आज लगभग सवा लाख कपड़ा व्यापारी अजमेरा फैशन से जुड़े हुए हैं, इनमे से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने सिर्फ 25-30 हज़ार रुपये लगा कर घर से ही साड़ियाँ या अन्य कपड़े बेचने का बिजनेस शुरू किया था और आज वे बड़े आराम से हर मंथली चालीस-पचास हज़ार रुपये मुनाफ़ा कमाते हैं.
कई ऐसे भी हैं, जिन्होंने ने अपनी पक्की दुकान कर ली और उनका महीने का मुनाफ़ा लाखों में है, और हाँ! इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं, दस हज़ार से भी अधिक!
दोस्तों, मेरा ये दृढ़ता से मानना है कि अगर मजदूर को मजबूत बनना है तो उसे कोई न कोई बिजनेस, कोई न कोई व्यवसाय ज़रूर करना चाहिए…क्योंकि सिर्फ यही है जो उसकी ज़िन्दगी बदल सकता है.
पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले धीरुभाई अम्बानी ने अपनी किस्मत बिजनेस से बदली. यहीं सूरत में हीरे पॉलिश करने का काम करने वाले Govind Dholakia ने डायमंड एक्सपोर्ट कम्पनी खड़ी कर अपना भाग्य पलट दिया. मैं खुद कभी कपड़ा बाज़ार में ब्रोकर का काम करता था….मैंने भी अपनी ज़िन्दगी बिजनेस से ही बदली….
दोस्तों, इस विडियो के माध्यम से मैं अपने मजदूर भाइयों-बहनों को यही सन्देश देना चाहता हूँ कि जब हज़ारों-लाखों लोग अपनी ज़िन्दगी बिजनेस के द्वारा बदल सकते हैं तो आप क्यों नहीं ? मैं कपड़ों के व्यवसाय से जुड़ा हुआ हूँ इसलिए कपड़ों के बिजनेस के बारे में बात करता हूँ,
लेकिन ज़रूरी नहीं कि आप कपड़ों का ही बिजनेस करें, आपको जो बिजनेस समझ में आये, जो काम-धंधा अच्छा लगे आप वो करिए…. लेकिन इस दिशा में कुछ न कुछ करिए ज़रूर….और कह दीजिये दुनिया वालों से कि –
ये बात ज़माना याद रखे मज़दूर हैं हम मजबूर नहीं I
ये भूख ग़रीबी बदहाली हरगिज़ हमको मँज़ूर नहीं
दोस्तों, अगर मेरी बात आपके दिल तक पहुंची हो तो इस आर्टिकल को शेयर करिए हमारे उन मजदूर भाइयों-बहनों के साथ जो कहीं न कहीं अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं.
पोस्ट को अंत तक पढने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद.
जय हिंद, जय भारत.
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Nice and good content.
Nice blog and good information
log extra saman dho dene ki zidd karte hai, we should be kind to poor and hardworking people.
This article really struck a chord with me. It brings to light the often-overlooked stories of India’s laborers, the unsung heroes who work tirelessly behind the scenes to keep the wheels of the country turning. The fact that there are over 40 crore workers, many in the unorganized sector, is a reminder of how deeply intertwined our daily lives are with their hard work.
What’s even more thought-provoking is the lack of security and basic protections they face. These workers don’t have guaranteed jobs, and often work in hazardous conditions without the safety nets we take for granted. It’s hard to imagine the kind of daily struggles they go through just to make ends meet.
Thank sir
I THINK I WILL DOING CLOTH BUSNESS
Ye baat dil ko chhoo gayi… main khud ek majdoor parivar se hun..main aapke saath jud akr business akrna chahta hun kaise kar sakte hain?
Thanks sir
Truly a heart-touching and eye-opening post! 🙏 The way you’ve portrayed the everyday struggles and silent strength of India’s labor force is both moving and inspiring. As someone deeply interested in grassroots empowerment, I believe every worker deserves not just respect, but also opportunity.
Doctor ke paas jaane par log poochte hai sir kitna paisa hua? Lekin labour ke sath bhada nakki karne ke baad bhi kuch log extra saman dho dene ki zidd karte hai, we should be kind to poor and hardworking people.